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ISSN 2292-9754

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06.24.2016


एक प्रश्न

रात के सनसनीख़ेज़ समाचारों की शृंखला में टीवी में नित्य की भाँति आज भी एक सनसनीख़ेज़ समाचार उस चैनल के हाथ लग ही गया था। एक युवक की हत्या, हत्या के पीछे साज़िश और साज़िश का कारण वही शाश्वत, प्रेम का त्रिकोण। युवक का अगले सप्ताह विवाह होने वाला था सब ओर उल्लास का वातावरण था, ऐसे में अचानक उसकी हत्या....? पूरी सम्भावना थी कि वह किसी की राह का काँटा था और वह लड़की जिससे उसका विवाह होना था उसे पाने के लिये इस काँटे को राह से निकाल फेंका गया था। फिर क्या था बन आई चैनल वालों की और बन गया सनसीखेज समाचार ....

"लड़की के प्रेमी ने उसके भावी पति की हत्या करवाई और अपने माता-पिता का एकमात्र बेटा इस प्रेम की बलि चढ़ा। जिन फूलों को वे अपने बेटे का सेहरा सजाने के लिये लाये थे उन्हीं फूलों से उन्होंने उसकी अर्थी सजाई। देखिये कैसे एक माँ अपने बेटे के लिये तड़प रही है पिता गुमसुम हो गये हैं देखने वाले उनका रोना देख कर दहल गये हैं"। ........

टीवी वाचक अपनी दमदार आवाज़ में जिस प्रकार समाचार की प्रस्तुति कर रहा था वह चैनल बदल रहे श्रोताओं को इसी चैनल पर थम जाने को विवश कर रही थी।

ऐसी घटनाएँ तो नित्य ही देश के किसी न किसी कोने में घटती रहती थीं पर यह समाचार प्रीतमपुरा कॉलोनी के लिये अचानक सनसनीख़ेज़ तब हो गया जब इसमें त्रिकोण के एक कोण पर सुदीपा का नाम आ गया, सुदीपा जो इस कॉलोनी के फ़्लैट नम्बर तीस में अपने माता-पिता के साथ जन्म से रह रही है, आज अचानक ही चर्चा का विषय बन गई थी। सुदीपा ने एक प्रतिष्ठित संस्थान से एम.बी.ए. किया था और अब एक मल्टी नेशनल कम्पनी में आठ लाख के पैकेज पर काम कर रही थी, पर यह कोई ख़ास बात नहीं है। आज के युग में बड़े शहर में ऐसी होनहार लड़कियों की कमी नहीं है। हाँ, वह पाँच फिट छः इंच की कमनीय गंदुमी रंगत और आकर्षक नैन-नक़्श की आधुनिक युवती है, पर ढेरों मिस वर्ल्ड मिस यूनिवर्स और रियलटी शो में विजयी सुन्दरियाँ देने वाले इस देश में ऐसी युवती का पाया जाना भी कोई विशेष बात नहीं है, पर आज इस सनसनीख़ेज़ समाचार का हिस्सा बनने के बाद उसका चर्चा का पात्र बनना अवश्यंभावी है।

कल तक जो पड़ोसी इतने व्यस्त थे कि आपस में दुआ-सलाम का भी अवकाश नहीं था आज इस विषय पर चर्चा के लिये एक दूसरे से बात करने के बहाने ढूँढ रहे थे। जो कभी बनर्जी; सुदीपा बनर्जी के पिता से बोले तक नहीं थे, आज शोक प्रकट करने उनके घर जा पहुँचे थे। सांत्वना की चाशनी में लपेट कर घुमा-फिराकर सुदीपा के परिवार से वह सच उगलवाने का प्रयास किया जा रहा था जिसके कारण सुदीपा के तथाकथित पूर्व प्रेमी ने उसके होने वाले पति की हत्या करवा दी।

सुदीपा और उसके माता-पिता के लिये अपने भावी जमाता सात्विक, जिसके साथ वह अपनी पुत्री का एक सप्ताह बाद धूमधाम से विवाह करने की पूरी तैयारी कर चुके थे, उसकी आज अचानक हत्या, एक सदमा था। वे यूँ ही इस समय एक यातना के दौर से गुज़र रहे थे ऊपर से लोगों की शंकापूर्ण निगाहें और उनके चुभते प्रश्नो ने उनका धैर्य चुका दिया और अन्त में श्री बनर्जी ने हाथजोड़ कर शोक प्रकट करने आए तथाकथित हितैषियों से उन्हें एकाकी छोड़ देने की विनम्र प्रार्थना की। वह बात दूसरी है कि उनकी विनम्र प्रार्थना भी उन हितैषियों को नागवार लगी, मानों मुँह में गुड़ के बीच में करेले का स्वाद आ गया हो, पर जब उनसे स्पष्ट शब्दों में जाने को कह दिया गया हो तो किया भी क्या जा सकता था। उनके बाहर आते ही बनर्जी के घर का दरवाज़ा भड़ से बन्द हो गया, जो स्पष्ट संकेत था कि लोग उनके फटे में टाँग न अड़ाएँ।

उसके बाद तो सुदीपा जिसके विषय में कोई जानता भी न था, उसके एक-एक पल के क्रिया-कलापों की शल्य चिकित्सा होने लगी। उसके यहाँ कौन-कौन आता था, वह कितनी देर तक बाहर रहती थी, पहनावा कितना आधुनिक था आदि सूत्रों से उसके चरित्र का आकलन किया जाने लगा। कॉलोनी के लेागों की कल्पनाशीलता मीडिया के समाचारों की उर्वरा पा कर अचानक उपजाऊ हो गई थी और अनेक कहानियाँ जन्म लेने लगी थीं। मिसेज़ बत्रा, सोनिया शर्मा को बता रही थी, "अरे सुदीपा तो यह शादी करना चाहती ही नहीं थी! वो तो बनर्जी बाबू इतना अच्छा वर पाकर ज़बरदस्ती उसका विवाह कर रहे थे! क्या पता था कि सुदीपा इस सीमा तक उतर जाएगी कि अपने प्रेमी के साथ मिल कर बेचारे मंगेतर की जान ही ले लेगी।"

"अच्छा तो क्या यह सुदीपा की मिली भगत थी?" मिसेज शर्मा अपने ज्ञान-कोष में इस रहस्य की बढ़ोत्तरी से उत्तेजित हो गई थी। "देखने में तो सीधी-साधी लगती थी, कौन कह सकता था कि उसके मन में क्या है?"

पर इस बारे में भी एक मत नहीं था जब मिसेज़ बत्रा मिसेज़ शर्मा के समक्ष यह रहस्य उजागर कर रही थीं, उसी समय गुप्ता जी की पत्नी उन्हें बता रही थीं "आपको पता है सुदीपा पहले अपने कॉलेज के लड़के के साथ घूमती-फिरती थी। वह बेचारा इसी भ्रम में था कि वह उसे चाहती है, पर जब अचानक ये पैसे वाला मिल गया तो सुदीपा ने उसे छोड़ दिया। एक तो प्यार में धोखा ऊपर से नाक के नीचे ही अपनी प्रिया का दूसरे के साथ विवाह, उम्र का जोश! उसे बर्दाश्त न हुआ, कर दिया खून।"

"तो क्या तुम जानती हो उस लड़के को?" गुप्ता जी ने पूछा।

"अरे एक लड़का, नाम-वाम तो हमें नहीं पता, पर पहले अक्सर आता तो था, वही मैं एक दिन सोच रही थी कि आजकल दिखाई क्यों नहीं पड़ रहा है।"

"अरे आजकल हमारे समय की ईमानदारी कहाँ रही, अब तो कोई अच्छा देखा नहीं कि पहले वाले को चलता किया।"

हवा में तैर रही ये कहानियाँ किसी न किसी हितैषी के माध्यम से बनर्जी के कानों तक पहुँच ही जाती थीं। एक सप्ताह हो गया पर किसी ने बनर्जी के परिवार के किसी सदस्य को नहीं देखा। पर आख़िर कब तक वे घर में बन्द रहते। हिम्मत करके बनर्जी कुछ दिनों बाद ऑफ़िस गये पर वहाँ भी लोगों की प्रश्न भरी सशंकित आँखें, वही झूठी सहानुभूति उनके लिये निश्चय करना कठिन हो गया किसको उनसे सच में सहानुभूति है और कौन उसकी आड़ में अपना मनोरंजन कर रहा है।

….अंत में उनका धैर्य चुक गया, जब लोगों के प्रश्नों का सामना करना असह्य हो गया तो उन्होंने समय से पूर्व ही अवकाश ले लिया है और घर बेचकर कहीं चले गये हैं।

लोगों का अनुमान था कि अवश्य ही सुदीपा के विरुद्ध सबूत मिल गये हैं कि उसने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अपने मंगेतर की हत्या करवाई है। अतः बेटी को बचाने के लिये पैसों का इंतज़ाम करने के लिये उन्हें घर बेचना पड़ा और अवकाश ले कर जो पैसा मिलेगा उसे वह मुकदमे में लगाएँगे।

धीरे -धीरे लोगों की रुचि इस कहानी में कम होने लगी वे भूल से गये कि सुदीपा नाम की कोई लड़की और उसके माता-पिता तीस नम्बर फ़्लैट में रहते थे और उसके साथ कोई घटना घटी थी।

एक दिन गुप्ता जी ने समाचार पत्र के किसी अन्दर के पन्ने पर पढ़ा कि सुदीपा के मंगेतर का ख़ून सात्विक के जज पापा के एक दुश्मन ने किया था जिसे उन्होंने कभी सज़ा सुनाई थी। वह हत्यारा पकड़ गया है और उस पर मुक़द्दमा चल रहा है।

गुप्ता जी ने अपनी पत्नी को बताया तो वो बोली, "हमें तो पहले ही लग रहा था कि इसके पीछे कोई साज़िश है। पर लोग तो बेचारी सुदीपा को ही दोष देने लगे।" गुप्ता जी पत्नी का मुँह देख रहे थे।

उस हत्यारे को तो पकड़ लिया गया था उस पर मुक़द्दमा भी चल रहा था, पर एक प्रश्न अभी भी हवा में तैर रहा है कि वो मीडिया जिसने अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिये आधा-अधूरा सच प्रसारित कर, सनसनी फैला कर और वो पड़ोसी जिन्होंने अपने मनोरंजन के लिये बिना सच जाने उस सनसनी को हवा दे कर, सुदीपा के सम्मान की हत्या की थी तथा उस के घरवालों को दर-दर भटकने के लिये विवश किया था, क्या उन पर भी कभी कोई मुक़द्दमा चलाएगा?


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