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| 09.22.2007 |
अलका चित्राँशी |
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2 इस वाक् युद्ध में मेरी हालत रद्दी वाले के सामने खिसियानी बिल्ली सी हो गई और वो नामुराद मेमसाहब-मेमसाहब का राग अलापता मेरी बरसों की जमा पूँजी मेरी आँखों के सामने समेट ले गया। इन सब घटनाओं ने मुझे इतना आहत कर दिया था कि मैं श्रीमतीजी से न बोलने में ही अपनी भलाई समझने लगा। घर में बची-खुची जो शान्ति है वो बनी रहे इसके लिये यह नितान्त आवश्यक था। मेरा बोलना श्रीमती जी के लिये मेरी मूक सहमति बन गया। और वे नित नये वास्तु प्रयोग करने लगीं, कभी ड्राइंग रूम में उलट फेर तो कभी बेडरूम, कभी स्टडी रूम तो कभी किचन, हर रोज नये प्रयोजन होते। इन परिवर्तनों से कुछ लाभ हुआ हो या नहीं ये तो मुझे पता नहीं पर मेरा हीमोग्लोबिन जरुर घटता जा रहा है। श्रीमती जी से बड़ी कोशिशों के बाद किस तरह कहा यह मेरा दिल ही जानता है इस पर मुझे घुन्ने का टाइटिल तो उन्होंने वैसे ही थमा दिया जैसे साहित्य सम्मेलन में शाल थमा दी गई हो। बात आगे न बढ़ जाए इसलिए चुपचाप बाहर आ लान में टहलने लगा तभी नज़र लेटर बाक्स में पड़े पत्र पर गयी। उठा कर देखा तो श्रीमती जी के भाई अर्थात् मेरे साले के विवाह का निमंत्रण पत्र था। आज प्रथम बार ससुराल से आये पत्र से मुझे वास्तविक खुशी का अहसास हुआ या यों कहें कि कुछ दिन के लिये ही सही यह पत्र देवदूत की भाँति मेरे वास्तु रूपी कष्ट से मुझे मुक्ति दिलाने वाला प्रतीत हुआ। सो गुनगुनाते हुए अन्दर पहुँचा और निमंत्रण पत्र श्रीमती जी की पसंदीदा ब्राण्ड की डिज़ाइनर साड़ी की तरह उनके हाथों में थमा दिया। मेरा ये रूप उनके लिये अप्रत्याशित सा था फिर भी चतुर नार की तरह समय का फ़ायदा उठाते हुए तुरंत रुपयों की माँग कर दी जो उन्हें भाई की शादी में खर्च करने हैं। फिर कौन सी साड़ी कब पहननी है उसका रंग कैसा हो उससे मैच करते हुए गहनों के बारे में विचार करते हुए खरीददारी करने की एक लिस्ट बन गई। मैं मन ही मन अपने किये पर पछताया कि क्यों कार्ड को हाथ लगाया, खुद उठाती तो शायद कुछ कम में ही काम बन जाता। अब तो मुसीबत गले पड़ गई है फिर भी मन के किसी कोने में सुख का अहसास हिलोरे ले रहा था जो श्रीमती जी के मायके जाने के उपरान्त मेरे जीवन में खुशियाँ लाने वाला था। इसलिए कह दिया कि कल बैंक खुलने का इंतज़ार करो, जितने की आवश्यकता हो उससे एक आध हज़ार ज़्यादा ही निकाल लेना, अरे तुम्हारे भाई की शादी है। और कल ही तुम्हारा रिजर्वेशन करा देता हूँ जिससे तुम समय से पहुँच जाओ। मेरा यह कहना था कि उनका गुस्सा ज्वलामुखी सा फूट पड़ा। बोली तुम्हारा रिजर्वेशन करा दूँ से क्या मतलब? मेरा भाई तुम्हारा भी कुछ लगता है। तुम्हें भी मेरे साथ चलना होगा और ध्यान रखना वहाँ तुम्हारी ये सम्मेलनीय पोशाक नहीं चलेगी। अपने अन्दर थोड़ा ‘ड्रेस सेंस’ डवेलप करो, लेकिन शादी में तुम्हारे पहनने के लिये तो मुझे ही कपड़े खरीदने पड़ेंगे। अगले दिन वो मार्केट से इन्द्रधनुषी छटा बिखेरती कुछ कपड़े मेरे लिये ले आयी। कपड़े ऐसे जिसे पहनकर अगर मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में भाग लूँ तो हर वर्ष ताज मेरे ही सिर पर पहनाया जाये। ऐसे कपड़े पहनकर जब मैंने शादी में शिरकत की तो हद ही हो गई। दूल्हे से ज्यादा सबका ध्यान मेरी ही ओर था। जो मुझे देखता मुस्कुराता और कन्नी काट कर निकल जाता। मैं जिसकी तरफ मुखातिब होता वो अंग्रेज़ी में ‘एक्सक्यूज़ मी’ कह कर खिसक जाता। थक हार कर मैं खाने की मेज की ओर बढ़ा ही था कि देखा कुछ लोग श्रीमती जी को शहर के नामी गिरामी साइकेट्रिस्टों के नाम सुझा रहे थे कि अभी बीमारी ठीक होने की अवस्था में है इसलिये ज़रा सी भी देरी किये बगैर भाई साहब का इलाज शुरु कर दो। जल्दी ठीक हो जायेंगे, घबराना नहीं, हम सब तुम्हारे साथ हैं।
यह
सब
सुन
कर
जब
मैं
अपने
परिचितों
और
रिश्तेदारों
को
वस्तु-स्थिति
से
अवगत
कराने
को
लिये
जैसे
ही
उन
लोगों
की
ओर
मुखातिब
हुआ
तो
वे
मुझे
पागल
समझ
मेरी
हाँ
में
हाँ
मिलाने
लगे
और
जिसे
मौका
लगता
वो
‘सुट्ट’
से
गायब
होता
जैसे
गदहे
के
सर
से
सींग।
धीरे-धीरे
सब
गायब
और
मैं
पंडाल
में
अकेला
रह
गया।
उस
वक्त
मेरा
मन
शीश
पर
उगे
केशों
को
नोंचने
के
लिये
मेरे
हाथों
को
प्रेरित
कर
रहा
था।
मैंने
अपने
मन
का
समझाया,
न
भइये
अभी
तक
तो
श्रीमती
जी
के
प्रयत्नों
ने
मुझे
सनकी
और
पागल
की
उपाधि
ही
प्रदान
की
है,
लेकिन
तेरी
ये
हरकत
तुझे
आगरा
भेज
कर
ही
छोड़ेगी।
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