अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.22.2007
 
सुलेखा
अलका चित्राँशी


2

एक जलसे में सभी बच्चों को प्रमाणपत्र मिलने थे। जिसकी तैयारी स्कूल में बड़े जोर-शोर के साथ चल रही थी। मुझे भी एक गीत में भाग लेना था जिसके लिये एक सफेद सलवार सूट चाहिए था। अचानक मेरे लिए सलवार सूट ले पाना सम्भव था। अत: मैने इसकी माँग अपनी मालकिन से ठीक उसी तरह कर दी जिस तरह हठपूर्वक बच्चे अपने माता-पिता से करते हैं। क्योंकि मुझे विश्वास था कि कदम-कदम पर मदद करने वाली मेरी मालकिन अवश्य ही मुझे नया सलवार सूट दिला देंगी। लेकिन उस दिन जो कुछ भी घटा उसकी कल्पना सपने में भी मैंने की थी। मालकिन का ऐसा रूप मेरे लिए अप्रत्याशित सा था। मुझे लगा मैंने कोई अपराध कर दिया है। मैं नजरें झुकाए मालकिन की बातें सुनती रही, जब लगा कि अब यहाँ खड़ा हो पाना सम्भव नहीं है तो मैं बिना किसी विलम्ब के तेजी से सड़क पर गई। मेरी आँखों से बहते आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे और मेरा मन मालकिन के उस रूप को स्वीकारने को तैयार था। मन में तीव्रतम उथल-पुथल हो रही थी उतनी ही तीव्रता से मेरे कदम बढ़ते जा रहे थे कि अचानक मुझे जोर का धक्का लगा और मैं एक ट्रक के सामने जा गिरी। मैंने उठने का निरर्थक प्रयास किया तब तक उसके पहिए मेरे एक पैर के ऊपर से गुजर गये। होश में आने पर पता चला कि मेरा एक पैर नहीं है। पैर खोने का दु: शायद कम होता अगर मेरे अपने मेरे आसपास नजर आते। नर्स से पता चला कि जिस दिन डाक्टर ने मेरे पैर काटने के बारे में माता-पिता को बताया उस दिन से लौट कर वे मेरी खबर लेने भी आये।

अगर आये तो वे लोग जरूर आये जिनके लिए मैं एक माध्यम थी। एक ऐसा माध्यम जिसके सहारे वे रातों-रात एक प्रतिष्ठित समाजसेवी बन वाहवाही लूटना चाहते थे। मेरी व्यथा को कम करने वाले मुझे उस कसाई से कम नहीं लग रहे थे जो बलि देने से पहले बकरे की खूब सेवा करते हैं। मेरे मन में इन लोगों के प्रति घृणा के सिवा कुछ था। मैं किसी भी कीमत पर इन लोगों की मदद नहीं लेना चाहती थी या यूँ कहें कि इन स्वार्थ लोगों की मदद नहीं करना चाहती थी। इस बीच शायद ऐसे भी लोग मुझसे मिलने आये थे जो वास्तव में मेरी मदद निस्वार्थ भाव से करना चाहते थे। पर मेरा मन अब कोई भी धोखा खाने को तैयार था इसलिए इन आने-जाने वाले लोगों में मैंने कोई विशेष रुचि दिखाई। मेरे इस व्यवहार से शायद अस्पताल के लोग थोड़ा चिन्तित दिखायी दे रहे थे क्योंकि वे चाहते थे कि पूर्णरूप से स्वस्थ होने तक कोई संस्था या परिवार मुझे आश्रय देने को तैयार हो जाये। लेकिन मेरे व्यवहार से उन्हें ऐसा नहीं लग रहा था कि स्वस्थ होने के उपरान्त मैं किसी की मदद स्वीकार करूँगी। मेरा मन तो इन आने-जाने वाले लोगों के बीच आज भी अपनी मालकिन को खोज रहा है इसलिए नहीं कि मुझे उनसे मदद की दरकार है सिर्फ़ ये जानने के लिये कि मैंने क्या अपराध किया था। मन के एक कोने में आज भी मालकिन के प्रति अगाध श्रद्धा थी क्योंकि उन्होंने ही मेरे जीवन को सँवारने का संकल्प लिया था, वो संकल्प जो एक माता पिता को लेना चाहिए था। फिर एस दिन ऐसा क्या हुआ जो उनका व्यवहार एकदम बदल गया। इस अनुत्तरित सवाल को जानने के लिए मैं एक बार अवश्य ही उनसे मिलना चाहती थी। एक दो दिन बाद मुझे नकली पैर लगाया जायेगा जिसके सहारे मैं फिर से चल फिर सकूँगी। यह जानकर मुझे जाने कितनी खुशी हो रही थी क्योंकि मैं नकली पैर लग जाने के बाद स्वयं चलकर मालकिन से मिलने जा सकूँगी और फिर जान सकूँगी वो सब जिसके कारण उस दिन मालकिन ने मेरे साथ ऐसा बर्ताव किया।

मैं पूर्णरूप से स्वस्थ हो गयी थी, मेरी अस्पताल से छुट्‍टी का दिन था। नर्स ने आकर मुझसे अपने साथ चलने को कहा। वह मुझे डाक्टर के कक्ष की ओर ले जा रही थी। पूछने पर बताया कि डाक्टर साहब मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मेरे दिमाग में विचारों का बवंडर घूमने लगा। मुफ्त में मेरा इलाज अपने किसी स्वार्थ के लिए इन लोगों ने किया है अब एस स्वार्थ सिद्धि का समय गया है। जो विचार बवंडर की भाँति दिमाग में घूम रहे थे वे शब्दों के माध्यम से बाहर निकलने को तैयार थे। कक्ष में पहुँचने पर डाक्टर साहब ने जैसे ही कुछ कहना चाहा मेरा आक्रोश पूरी तरह फूट पड़ा, जिसकी उम्मीद किसी को भी थी। सब आवाक मुझे देखते रहे। जब मैं कुछ शांत हुई तब डाक्टर साहब ने मुझे बैठने को कहा शायद वे मेरी मन:स्थिति से पूरी तरह परिचित हो चुके थे। तभी तो इतना सब कहने के बाद भी उन्होंने मुझे बैठने को कहा। मैं चुपचाप सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गई। तब उन्होंने मुझे बताया कि मेरे माता-पिता द्वारा मुझे अस्पताल में छोड़कर चले जाने के बाद मेरा इलाज मेरी मालकिन ने कराया आज मैं उन्हीं के कारण चलने लायक हो पायी हूँ। मेरे साथ हुई दुर्घटना से वे इतनी आहत हुई थी कि मेरे इलाज के लिए एवं मेरे भविष्य के लिए कुछ रकम अस्पताल आकर डाक्टर साहब को देकर इस शहर को छोड़ कर जाने कहाँ चली गयीं और हाँ जाने से पहले मेरे लिए एक पत्र अवश्य छोड़ गयी थी। उस पत्र एवं चेक को डाक्टर साहब ने मेरे सामने रख दिया जिसे स्पर्श करने की मेरी इच्छा नहीं हुई। मैं तो सिर्फ़ उस प्रश्न का उत्तर जानना चाहती थी जो शायद अब असम्भव था। जिसके लिए मन में अगाध श्रद्धा थी आज उसके लिए भी मन में जाने कितनी घृणा भर गई थी। क्यों शहर छोडकर चली गई, मेरी स्थिति के लिए शायद वहीं जिम्मेदार थीं तभी आँख मिलाने की भी हिम्मत नहीं हुई तिस पर मेरे पैर की कीमत भी आँक ली। कर लिया पश्चाताप! हो गयीं पाप से मुक्त! लेकिन मेरा क्या मैं किससे पूछने जाऊँ कि मेरी क्या गल्ती थी मैं कैसे प्रायश्चित करूँ।

अचानक जाने क्या हुआ मैने उस पत्र एवं चेक को पलक झपकते ही चिन्दी-चिन्दी करके कमरे में फैला दिया। मेरी आँखों से अश्रुधारा अनवरत बहने लगी और मैं आज फिर तेज कदमों से सड़क पर गई शायद उस धक्के की चाह में जो फिर से मुझे किसी ट्रक के सामने गिरा दे लेकिन आज मैं कोई निरर्थक प्रयास नहीं करूँगी, करूँगी तो सार्थक प्रयास जो मुझे मेरी मंजिल तक पहुँचायेगा!

पीछे -- 1, 2


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें