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09.22.2007
 
सुलेखा
अलका चित्राँशी

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मैं भी तो इंजन की भांति ही सबको उनकी मंजिल तक पहुँचाने का साधन मात्र हूँ। जिसके पीछे न जाने कितनों का काफ़िला रहता है फिर भी वह अकेला ही है। काफ़िला तो अपनी मंजिल के आने के आने तक ही उसका साथ देता है फिर वह रह जाता है नितान्त अकेला। क्या हर जगह स्वार्थ ही सर्वोपरि बन गया है। हर किसी का जुड़ाव सिर्फ़ स्वार्थ से प्रेरित होता है।

अब मेरे लिए यह पहचान करना बहुत ही कठिन हो गया है कि कौन अपना है कौन पराया। क्योंकि सबकी बातों में मिठास, अपनापन, हमदर्द सभी कुछ झलकता है। लेकिन यक सब वास्तव में मेरे हितैषी हैं, या इन सब का भी कोई न कोई स्वार्थ मेरे से सिद्ध होना है। जिस अपनेपन की तलाश मुझे बचपन से आज तक रही अब नहीं चाहती हूँ उसे पाना। क्यों सब मेरी मदद करना चाहते हैं क्योंकि मेरी मदद से उन्हें रातों रात एक समाज सेवी की उपाधि मिल जाएगी। अखबार में उनकी चर्चा उन्हें नामचीन लोगों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देगी।

कोई आठ बरस की थी मैं जब माँ कर तबियत अचानक एक दिन बिगड़ गयी। तीन चार दिन तक तो वो काम पर नहीं गयी थोड़ा ठीक हुई तो मुझे अपने साथ ले गयी अपनी मदद के लिए। फिर न जाने कब वो मुझसे ही सारा काम करवाने लगी। सुबह ले कर जाना और शाम को वापस लेकर आना ही उसका काम रह गया था।

किताबों कापियों और बस्ते का मोह न जाने कैसे स्वत: ही परिस्थिति वश कम हो गया था? या फिर माँ के साथ बंगलों में जाना वहाँ का रहन-सहन जीवन स्तर बतना प्रभावशाली था कि शुरू-शुरू में जाना बडा मनोरंजक लगा। हर मालकिन अपने बच्चे की उतरन, पुराने खिलौने और न जाने क्या क्या दे दिया करती। उन चीजों को पाने की लालसा में मैं छोटे-मोटे काम बड़ी खुशी से किया करती। बस बीच पता भी न चला कि कब माँ ने अपने काम की जिम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी और अब तो उसका काम सिर्फ़ मुझे लाना ले जाना तक ही सीमित होकर रह गया था। धीरे-धीरे उसने मुझे लाना ले जाना भी कम कर दिया हाँ उस दिन अवश्य मेरे साथ जाती जिस दिन मुझे तनख्वाह मिलनी होती थी। जहाँ का जीवन कभी बड़ा ही सुखद लगता था, वहाँ के कपडे़, खिलौने, खानपान जो मुझे आकर्षित करते थे उनको पाने की लालसा कभी मुझमें भी थी लेकिन इस तरह पाने की कभी कल्पना भी न की थी।

मेरे माता पिता ने भी मुझे पढ़ाना चाहा और शायद पढ़ाया भी। फिर अचानक ये परिवर्तन कैसे हो गया। जो मुझे पढ़ा लिखा कर अच्छी नौकरी कराना चाहते थे उन्होंने मुझे ऐसा जीवन जीने के लिए मजबूर क्यों कर दिया। कभी-कभी मालकिनों के बच्चों को पढ़ते देख मेरा मन भी करता कि मेरे माता-पिता भी मुझे इसी तरह पढ़ायें। कई बार माँ से कहा था कि मेरा दाखिला स्कूल में फिर से करा दे लेकिन माँ कितनी स्वार्थ हो जाती थी तब, और मैं मन मसोस कर रह जाती।

अब तो ऐसे जीवन जीना मेरी नियति बन चुकी थी इसलिए किसी से कुछ कहना ही छोड़ दिया था लेकिन शायद मेरी एक मालकिन मेरी मन:स्थिति भाँप गई थी तभी तो उन्होंने मुझे पढ़ाने के लिए माँ को कहा पर माँ तो जैसे मुझे पढ़ाना ही न चाहती थी क्योंकि मेरे पढ़ने जाने से उसे फिर बंगलों में काम करने जाना पड़ता। उसने मालकिन के आगे न जाने कितनी समस्या गिना डाली जिनके कारण वो न चाहते हुए भी मुझसे काम करवाती है। चाहती तो वो भी है पढ़ाना पर क्या करे। तिस पर मालकिन ने मेरी पढ़ाई का सारा खर्च उठाने की बात की तब क्या कहती। मालकिन ने मेरा दाखिला स्कूल में करा दिया। अब मैं काम भी करती और पढ़ने भी जाने लगी। इसी तरह मैंने दसवीं पास कर ली।

 

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