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| 09.07.2007 |
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कसक अलका चित्राँशी |
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“बचपन
के दिन भी क्या दिन थे”
जब भी कहीं यह गीत बज रहा होता है तो लगता है कि काश जीवन का सबसे लम्बा
समय बचपन ही होता तो कितना भला होता। किसे नहीं भाता बचपन?
शायद ही कोई ऐसा हो जो बचपन की यादों को भ्îला
पाया हो। हर चिन्ता,
परेशानी से मुक्त,
दीन दुनिया से बेख़बर एक ऐसी दुनिया,
जहाँ खेल-खिलौने,
शैतानियों का एक अनूठा साम्राज्य। पल-पल में झगड़ा,
पल-पल में मेल,
कब रूठे गये कब मान गये क्या पता?
सब अपने मन के राजा,
सबका अपना राज-पाट,
अपना नियम कानून,
जो मन को भाये वही ठीक,
बाकी बेकार।
उस अनूठी दुनिया की यादें ताज़ा करने के लिये एक बार ही सही अपने आस-पास
किसी बचपन को तलाशिये,
आपको खुद की झलक दिखायी दे जायेगी। एक बार ज़ेहन में सारी शैतानियाँ ताज़ा हो
के चेहरे पर मुस्कान छोड़ जायेंगी।
दो दिन जब न कोई अपना न पराया था,
न मन में तेरा मेरा का भाव था। जो भी था सबका था,
हमारा था। किसी के भी आँगन में जमा होकर धमाचौकड़ी करना,
पतंग उड़ाना,
फट जाने पर अम्मा से आँख बचाकर चौके में रखी पतीली से भात चुरा कर चिपकाना,
गर्मी की तपती दुपहरी में अन्त्याक्षरी खेलना,
बारिश में कागज़ की नाव पानी में तैराना,
मछलियाँ पकड़कर बोतल में पालना और न जाने क्या-क्या!
सबसे ज्यादा मौज-मस्ती के दिन गiर्मयों
में आते थे जब सभी ममेरे और मौसेरे भाई-बहन ननिहाल में अपना आँतक मचाने के
लिये जमा होते। ऐसा आँतक जिसका सभी बेसब्री से इंतज़ार करते। नाना-नानी की
छत्र-छाया में ये आँतकी समूह नित-नये कारनामों को अंजाम देता,
जिससे न तो कोई भयभीत होता न नाराज़,
सबके चेहरे पर मुस्कान होती। रात को सोने से पहले ही अगली दिनचर्या तय हो
जाती कि कौन रसोई की अलमारी से लाल पेड़े चुरायेगा,
कौन गुलेल बनायेगा,
कौन आम तोड़ने के लिये लग्गी बनायेगा,
कौन माचिस की खाली डिब्बी का टेलीफोन बनायेगा। सबके हिस्से का काम बाँटने
के बाद पहेलियाँ बूझते-बूझते कब नींद आ जाती पता न चलता और सुबह होते ही
चंडाल चौकड़ी अपने अभियान पर निकल पड़ती।
एक ऐसा अभियान जिसमें न भूख सताती,
न प्यास,
न ही सूरज की तपिश परेशान कर पाती। एक होड़ सी होती सबमें,
अपने काम को अंजाम देने के लिये। चुरा कर तोड़े गये आम मिल बाँट कर खाना एक
असीम खुशी दे जाता। एक ऐसी खुशी जिसका अहसास आज भी चेहरे पर मुस्कान फैला
देता है। शैतानियों के बीच जब कभी भी याद आता कि अम्मा घर पर नाराज हो रही
होंगी तो भाग कर घर आ जाना,
फिर शरीफों की तरह बिना अम्मा के कहे फटाफट काम करने लगना,
हम लोगों की चालाकी पर अम्मा मुस्कुरा कर रह जाती और हमें लगता कि वो हमसे
नाराज़ ही नहीं हुई थीं। मन एक खुशी से भर उठता। लगता हम जो कर रहे हैं वो
सब ठीक है। तभी तो खेतों में रखे पुआल के ढेर से ऊपर चढ़कर फिर फिसलना,
बैलगाड़ी में चुपचाप दौड़कर पीछे बैठ जाना कितना सुखद लगता। खेलकूद कर जब
थक जाते तो घर की याद सताती,
आते ही खाने पर टूट पड़ना। कितना प्यार लगता चौके के बाहर बैठ कर खाना
खाना। अम्मा गर्म-गर्म फुलके सेंकती और बड़े प्यार से खिलाती।
ये मीठी-मीठी यादें आज मन को झकझोर कर रख देती हैं लगता है जैसे गुजरे
जमाने की बात हो सब कुछ कितना बदला-बदला सा नज़र आता है। वो प्यार वो अपनापन
सब न जाने कहाँ खो गया है। क्यों सब इतना बदल गया है। शायद इसलिये कि पैसा
कमाने की चाह में मैं अपनों से दूर सात समन्दर पार आ गया। जहाँ आकर मैं
सिर्फ़और सिर्फ़एक मशीन बन गया हूँ पैसा कमाने की और जो मेरे हैं सिर्फ़
इसलिये कि वे मुझ पर अपनी ज़रूरतों के लिये आश्रित हैं। जिस शोहरत और रुतबे
की चाह थी सब मेरे पास है फिर भी न जाने क्या कमी है जो इस सब के बाद भी
खलती है। शायद अपनों का प्यार ही तो है। बचपन में परीक्षा में उत्तीर्ण
होने पर जो उल्लास और उत्साह घर में होता है वो खुशी इतना सब होने के बाद
भी मुझसे कोसों दूर क्यों है?
कितना अच्छा लगता था सबको खुश देखकर,
उस वक्त मोती चूर के लड्डूओं की मिठास भी दुगनी हो जाया करती थी। अपने
आस-पास अपनों का अहसास गiर्वत
कर जाता था। छोटी-छोटी खुशियाँ आपस में बाँटना एक जश्न जैसा होता। लगता
सारे ज़माने की खुशियाँ मिल गयी हैं।
वो होली का हुड़दंग जो होली के एक महीने पहले की तैयारी के साथ शुरु हो
जाता। किसको-किसको रंगों में रंग कर भूत बनाना है रोज़ यही सोचना चाहे फिर
खुद ही भूत बन जायें।
लेकिन होली के ये रंग जीवन में खुशियों की जो इन्द्रधनुषी छटा बिखेर जाते
आज वो छटा बादलों के पीछे न जाने कहाँ खो गयी है। आज भी याद आता है अम्मा
का नाराज़ होना जब हम सब गुझिया बनवाने को बहाने अम्मा के चारों और घेरा
बनाकर बैठ जाते और मौका पाते ही खोया चुरा कर खा लेते। देख लेने पर अम्मा
भगा देती। आज उस स्वाद को तरसना जैसे नियति ही बन गयी है। उन गुझियों का
स्वाद माँ की ममता रूपी चाशनी से भीता होता था तभी तो इतना स्वादिष्ट था।
आज भी याद है वो क्षण जब मेरी पढ़ाई के लिये माँ मुझे शहर से भेजने को तैयार
हुई थी। कितना रोया था मैं माँ को देख कर कि रोक ले माँ मैं वहाँ नहीं रह
पाऊँगा। किस तरह कलेजे के टुकड़े को माँ ने तरक्की की खातिर अपने से दूर
भेज दिया था।
एक बार तरक्की की खातिर जो घर से गया फिर उसी के बहाने दूरी बढ़ती चली गयी।
तरक्की की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते आज उस जगह पहुँच गया हूँ जहाँ सारी आशाएँ
आकाँक्षाएँ पाने की न तो चाह ही रही न अभिलाषा। पाना चाहता हूँ तो सिर्फ़वो
दिन जो अपनत्व का अहसास कराते थे। हर वो एक पल जो आँखों में खुशी के आँसू
छलका जाते थे। हर उस महक को महसूस करना चाहता हूँ जिससे अपनी माटी की
खुश्बू आती है। हर वो रंग अपने जीवन के कैनवास पर भरना चाहता हूँ जो
खुशियों की इन्द्रधनुषी छटा से मुझे सराबोर कर देते थे। लौटना चाहता हूँ उन
लोगों के बीच जो मेरे अपने हैं जिनके साथ मेरे जीवन के सबसे सुनहरे दिनों
की यादें जुड़ी हैं। देखना चाहता हूँ वो बचपन दोबारे। जो हमने जिया था। उन
यादों को सहेजना चाहता हूँ जो मेरे अन्र्तमन को सकून दे सके। उन मनकों को
एक माला में फिर से पिरोना चाहता हूँ जो तरक्की की राह में धागे से टूटकर
बिखर गये। ऐसी तरक्की जिसने पैसे की खातिर सब कुछ छीन लिया।
काश मैं उन पलों को दोबारा जी पाऊँ। बुला लो मुझे आवाज़ दे कर,
एक बार ही सही आवाज़ तो दो। कई बार पीछे मुड़-मुड़ कर देखा। मेरी आँखें
शून्य में न जाने क्या खोजती रह जाती हैं और पाता हूँ मैं खुद को एकदम
अकेला भीड़ के बीच,
जहाँ मेरी निगाहें खोजती फिरती हैं वो लम्हे जिनकी कसक आज भी मेरे मन में
उठती रहती है। |
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