| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 09.07.2007 |
|
चाँदनी
धूप अलका चित्राँशी |
|
3
रेनू सारा सामान लेकर जैसे ही घर पहुँची, बरामदे में फैले पानी में फिसल कर गिर गई। हाथ में लिया सारा सामान बरामदे में बिखर गया। किसी के गिरने की आवाज़ सुन कर उसकी सास जैसे ही बाहर आयी तो देखा कि रेनू बरामदे में फैला सामान समेट रही है। उन्होंने देखा कि फिसल कर गिरने को कारण रेनू के सारे कपड़े पानी से भीग चुके थे। तुरंत सहारा देकर उन्होंने रेनू को उठाया। रेनू को चलने में तकलीफ हो रही थी। माँजी उसे सहारा देकर धीरे धीरे कमरे में ले गईं और फिर भाग कर दूसरे कमरे में जाकर कुछ ढूँढने लगीं। रेनू ने घर में फैले पानी को देखकर सोचा बूढ़ी कर क्या रही थी जो इतना पानी फैल गया। ओह पूजा का इंतज़ाम! ये पूजा करने के लिए घर साफ कर रही थी कि मेरी टाँग तोड़ने के लिए पानी फैला रही थी।
तब
तक
रेनू
की
सास
हाथ
में
एक
शीशी
लिये
कमरे
में
आयीं
और
उन्होंने
रेनू
से
कहा-
कितनी
चिंता
है
इस
बुढ़िया
को
अपनी।
तभी
तो
बड़े
प्यार
से
तेल
चुपड़
रही
है।
मैं
दो
दिन
भी
लेट
गयी
तो
इसकी
तो
नानी
मर
जायेगी
काम
करते
करते।
नहीं
मक्खन
तो
तेल
ही
सही,
लगा
ले,
लगा
ले।
मैं
न
उठी
तो
तेरे
सारे
काम
कौन
करेगा?
सारे
काम
करने
से
तो
थोड़ी
मालिश
करना
ही
तेरे
लिए
ठीक
है। रेनू का सिर सहलाते-सहलाते आज एक माँ को अपनी बेटी की याद हो आई। रेनू के मासूम चेहरे में उसे गुड़िया का चेहरा याद आ गया। कितना क्रूर बन गया था विधाता। एक माँ की खुशियाँ नहीं देखी गयीं! छीन लीं सारी खुशियां! दस बरस की तो थी जब विधाता ने उससे उसकी गुड़िया को छीन लिया था। कितने अरमान सजाये थे। उसे क्या-क्या सिखाना चाहती थी। सब अरमान एक ही पल में चकनाचूर हो गये। जो सपने गुड़िया को लेकर बुने थे, वो सारे सपने रेनू ने तो पूरे कर दिये, फिर भी उसे अपनी गुड़िया क्यों न बना सकीं? कितना ख्याल रखती है रेनू! हर चीज माँगने से पहले ही लेकर खड़ी हो जाती है। जब वो मेरे मन की बातें बिना बोले ही समझ जाती है तो मैं क्यों न उसके मन की बात जान सकी? क्यों उसे अपनी बेटी न बना पाई? माँ की आँखों से निकले मोती रेनू के माथे पर अनायास ही गिर पड़े। तब उसे लगा कि माँ रो रही है। जब तक उसने आँख खोली, माँ की धोती का आँचल उन मोतियों को समेट चुका था। लेकिन फिर भी आज माँ के चेहरे से, बेटी के लिए चिन्ता के चिन्ह साफ झलक रहे थे। उससे रहा न गया और वो पूछ ही बैठी- “माँ आप रो रही हैं?”
फिर
माँ
का
स्वर
भी
आँखों
के
साथ-साथ
भीग
गया।
बोली-
“आज
विधाता
ने
मुझे
मेरी
बेटी
फिर
से
लौटा
दी।
उसी
खुशी
में
आँख
नम
हो
गयी।
रेनू
को
भी
आज
अपनी
माँ
मिल
गयी।
मन
में
पश्चाताप
के
भाव
थे
फिर
भी
तसल्ली
थी
कि
माँ
के
बारे
में
जो
भी
सोचती
थी,
आज
तक
किसी
से
न
कह
कर
ठीक
ही
किया,
नहीं
तो
उसे
कभी
भी
अपनी
माँ
न
मिल
पाती।
फिर
अपनी
बचकानी
बातें
याद
आ
गईं
जो
वो
अपनी
माँ
के
बारे
में
सोचती
थी
या
सोचना
उसकी
फ़ितरत
बन
गई
थी।
उसके
चेहरे
पर
हँसी
की
लहर
दौड़
गयी। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|