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09.07.2007
 
चाँदनी धूप
अलका चित्राँशी

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रेनू सारा सामान लेकर जैसे ही घर पहुँची, बरामदे में फैले पानी में फिसल कर गिर गई। हाथ में लिया सारा सामान बरामदे में बिखर गया। किसी के गिरने की आवाज़ सुन कर उसकी सास जैसे ही बाहर आयी तो देखा कि रेनू बरामदे में फैला सामान समेट रही है। उन्होंने देखा कि फिसल कर गिरने को कारण रेनू के सारे कपड़े पानी से भीग चुके थे। तुरंत सहारा देकर उन्होंने रेनू को उठाया। रेनू को चलने में तकलीफ हो रही थी। माँजी उसे सहारा देकर धीरे धीरे कमरे में ले गईं और फिर भाग कर दूसरे कमरे में जाकर कुछ ढूँढने लगीं। रेनू ने घर में फैले पानी को देखकर सोचा बूढ़ी कर क्या रही थी जो इतना पानी फैल गया। ओह पूजा का इंतज़ाम! ये पूजा करने के लिए घर साफ कर रही थी कि मेरी टाँग तोड़ने के लिए पानी फैला रही थी।

तब तक रेनू की सास हाथ में एक शीशी लिये कमरे में आयीं और उन्होंने रेनू से कहा-
ला बेटी, पैर में नूरानी तेल लगा दूँ। तेरी मोच जल्दी ठीक हो
जायेगी।
अरे माँजी मैं खुद लगा लूँगी। आप परेशान हों थोड़ा दर्द है। थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा।
अपने आप कैसे ठीक हो जायेगा? लाओ मैं तेल लगाकर मालिश कर दूँ।” - कहते कहते वे रेनू के पैर में तेल लगाने लग गयीं। रेनू को आराम मिला और वो कुर्सी की पीठ पर टेक लगाकर आँख बन्द करके सोचने
लगी।

कितनी चिंता है इस बुढ़िया को अपनी। तभी तो बड़े प्यार से तेल चुपड़ रही है। मैं दो दिन भी लेट गयी तो इसकी तो नानी मर जायेगी काम करते करते। नहीं मक्खन तो तेल ही सही, लगा ले, लगा ले। मैं उठी तो तेरे सारे काम कौन करेगा? सारे काम करने से तो थोड़ी मालिश करना ही तेरे लिए ठीक है।
रेनू को आराम से लेटा देख कर जैसे ही उसकी सास उठी, रेनू की आँख खुल गयी और वह उठने लगी। माँजी ने डाँट कर उसे लेटने को कहा। थोड़ी देर में वो हल्दी वाला गुनगुना दूध और खाने के लिए कुछ लेकर आयीं। रेनू को अपने हाथ से दूध पिलाया और पूछा, “अब कैसा दर्द है बेटी? ज्यादा तकलीफ है तो डाक्टर को बुला लाऊँ?” फिर उसके पास बैठ कर उसके सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरने लगीं। पता नहीं रेनू को क्या हुआ कि वो अपना सिर सास की गोद में रख कर लेट गयी। आज उसे अपनी माँ की याद गई। उसकी आँखों से, चाहकर भी कुछ मोती उसके गाल पर लुढ़क गये। उसे वह लम्हें याद गए जब उसकी माँ इसी तरह से उसकी तकलीफ़ देखकर परेशान हो जाया करती थीं। उसकी सेवा में जी जान से जुट जातीं फिर उन्हें अपनी चिन्ता रहती। हर पल उसका ध्यान रखना बार-बार पूछना कि क्या खाने का मन है, दर्द तो नहीं, सिर में तेल डाल दूँ और गोद में सिर रखकर सहलाना। आज उसे अपनी माँ की याद गयी। क्यों आज तक वह सास में माँ को नहीं खोज पायी? फिर आज क्या ऐसा हुआ जो आँख नम हो आयी.. उनका बर्ताव देखकर! वो उन्हें अपनी माँ क्यों नहीं समझ पायी? हर पल उनके बारे में बुरा सोचना तो जैसे उसकी फ़ितरत बन चुकी थी। वो तो यही सोचती थी कि उन्हें बहू नहीं, एक नौकरानी चाहिए थी सो आज तक वे नौकरानी ही बनी रही। उसने भी तो कोशिश नहीं की कि वह बहू से बेटी
बने।

रेनू का सिर सहलाते-सहलाते आज एक माँ को अपनी बेटी की याद हो आई। रेनू के मासूम चेहरे में उसे गुड़िया का चेहरा याद गया। कितना क्रूर बन गया था विधाता। एक माँ की खुशियाँ नहीं देखी गयीं! छीन लीं सारी खुशियां! दस बरस की तो थी जब विधाता ने उससे उसकी गुड़िया को छीन लिया था। कितने अरमान सजाये थे। उसे क्या-क्या सिखाना चाहती थी। सब अरमान एक ही पल में चकनाचूर हो गये। जो सपने गुड़िया को लेकर बुने थे, वो सारे सपने रेनू ने तो पूरे कर दिये, फिर भी उसे अपनी गुड़िया क्यों बना सकीं? कितना ख्याल रखती है रेनू! हर चीज माँगने से पहले ही लेकर खड़ी हो जाती है। जब वो मेरे मन की बातें बिना बोले ही समझ जाती है तो मैं क्यों उसके मन की बात जान सकी? क्यों उसे अपनी बेटी बना पाई? माँ की आँखों से निकले मोती रेनू के माथे पर अनायास ही गिर पड़े। तब उसे लगा कि माँ रो रही है। जब तक उसने आँख खोली, माँ की धोती का आँचल उन मोतियों को समेट चुका था। लेकिन फिर भी आज माँ के चेहरे से, बेटी के लिए चिन्ता के चिन्ह साफ झलक रहे थे। उससे रहा गया और वो पूछ ही बैठी- “माँ आप रो रही हैं?”

फिर माँ का स्वर भी आँखों के साथ-साथ भीग गया। बोली- “आज विधाता ने मुझे मेरी बेटी फिर से लौटा दी। उसी खुशी में आँख नम हो गयी। रेनू को भी आज अपनी माँ मिल गयी। मन में पश्चाताप के भाव थे फिर भी तसल्ली थी कि माँ के बारे में जो भी सोचती थी, आज तक किसी से कह कर ठीक ही किया, नहीं तो उसे कभी भी अपनी माँ मिल पाती। फिर अपनी बचकानी बातें याद गईं जो वो अपनी माँ के बारे में सोचती थी या सोचना उसकी फ़ितरत बन गई थी। उसके चेहरे पर हँसी की लहर दौड़ गयी।
माँ उसके चेहरे पर हँसी देख कर निश्चिन्त हो गयी। आज एक माँ को उसकी बेटी और एक बेटी को उसकी माँ मिल गयी। दोनों एक दूसरे के चेहरे को देखकर हँस
पड़ीं।

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