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| 09.07.2007 |
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चाँदनी
धूप अलका चित्राँशी |
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2
घड़ी
की
ओर
नज़र
उठाकर
देखा
तो
उसे
लगा
कि
फिर
मर
गए,
आज
फिर
बुढ़िया
की
वजह
से
देर
होगी।
फटाफट
निकलूँ
नहीं
तो
बॉस
की
खरी-खोटी
सुननी
पड़
जायेगी। आफिस
के
सामने
टैक्सी
से
उतरने
पर
घड़ी
देखी...
“थैंक
गाड!
ठीक
समय
पर
आ
ही
गई,
वरना
मेरी
खैर
नहीं
थी।” दोनों एक साथ आफिस की सीढ़ियाँ चढ़ने लगीं। .... बड़ी जल्दी ताड़ जाती है। लेकिन मैं कोई कम थोड़े हूँ जो अपनी खिल्ली उड़वाने के लिए तुझे बता दूँ कि क्यों देर हो गई। खुद तो बड़ी दूध की धुली है न, मैं तो काम करती हूँ, अपने को देख तूने तो घर में दो चूल्हे करा दिये हैं। वैसे भी तेरी जन्म की आदत है दूसरे के फटे में टाँग अड़ाने की। अरे! अपनी देख, मेरी चिन्ता छोड़।...
“रेनू,
मेरी
एक
फाइल
आज
तुम
देख
लो,
मेरे
पास
काम
थोड़ा
ज्यादा
है
और
सर
जल्दी
माँग
रहे
हैं।” .... जबान पर आकर रुक गया नहीं मन तो कर रहा था कि कह दूँ फैशन-वैशन में तो अव्वल पर काम में मन नहीं लगता। नहीं लगता तो घर बैठ। मैं तेरा काम करूँगी तो अपनी सैलरी मुझे दे देगी क्या। दूसरों की बातों में तो तेरी जान अटकी रहती है। रोज़ एक-एक फाइल भी निपटाती तो मेज पर ढेर नहीं लगता। अब बॉस की डाँट खा, तभी मेरे कलेजे को ठण्डक मिलेगी। बड़ी आई मुझसे काम करवाने वाली-.... रेनू फटाफट अपनी फाइलें निपटाने लग गयी। अभी उसे कुछ लेटर भी टाइप करके प्रिंट आऊट निकालने थे। इन सब कामों में कब चार बज गये पता ही न चला। वह फाइलें समेट ही रही थी कि सीमा ने आवाज़ दी।
“रेनू
टाइम
हो
गया।
क्या
आज
घर
नहीं
जाना
है?
तू
तो
कह
रही
थी
कि
जल्दी
जायेगी।” |
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