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09.07.2007
 
चाँदनी धूप
अलका चित्राँशी

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घड़ी की ओर नज़र उठाकर देखा तो उसे लगा कि फिर मर गए, आज फिर बुढ़िया की वजह से देर होगी। फटाफट निकलूँ नहीं तो बॉस की खरी-खोटी सुननी पड़ जायेगी।
माँ जी आपके व्रत का सारा इंतज़ाम कर दिया है आप खा लीजिएगा। मैं आफ़िस के लिए निकलती हूँ।
अच्छा बेटा, अपना ख्याल रखना और हाँ आफिस से आज समय से ही जाना मुझे शाम को पूजा भी करनी है। तुम भी इसमें मेरे साथ रहो तो ठीक रहेगा।
अच्छा माँ जी मैं कोशिश करूँगी जल्दी आने की। रेनू सास के पैर छू कर घर से निकल गयी।
...
तुम अपना ख्याल रखना! अरे तेरी देखभाल से फुर्सत मिले तब तो अपने बारे में सोचूँ। शाम को जल्दी जाना! .. माता जी को पूजा करनी है.. पूजा वाला कमरा धोना पड़ेगा, जब मैं आऊँगी तभी तो धुलेगा! फिर जीमने के लिए भी तो कुछ स्पेशल चाहिए, व्रत है , कहीं कम खाया तो कमजोरी जायेगी ! रेनू लगातार सोचती जा रही थी।

 आफिस के सामने टैक्सी से उतरने पर घड़ी देखी... “थैंक गाड! ठीक समय पर ही गई, वरना मेरी खैर नहीं थी।
           
हाय रेनू! इतनी हड़बड़ाहट में जल्दी-जल्दी कहाँ भागी जा रही है। मैं कब से तुझे आवाज़ दे रही हूँ। उसकी सहेली सीमा ने पीछे से आवाज़ देते हुए कहा।
            
हाय सीमा, भाग नहीं रही हूँ। मैंने तेरी आवाज़ सुनी ही नहीं। आज ट्रैफ़िक में फंस गई थी इसलिए थोड़ी टेंशन थी कि कहीं लेट हो जाऊँ।

दोनों एक साथ आफिस की सीढ़ियाँ चढ़ने लगीं।

.... बड़ी जल्दी ताड़ जाती है। लेकिन मैं कोई कम थोड़े हूँ जो अपनी खिल्ली उड़वाने के लिए तुझे बता दूँ कि क्यों देर हो गई। खुद तो बड़ी दूध की धुली है , मैं तो काम करती हूँ, अपने को देख तूने तो घर में दो चूल्हे करा दिये हैं। वैसे भी तेरी जन्म की आदत है दूसरे के फटे में टाँग अड़ाने की। अरे! अपनी देख, मेरी चिन्ता छोड़।...

रेनू, मेरी एक फाइल आज तुम देख लो, मेरे पास काम थोड़ा ज्यादा है और सर जल्दी माँग रहे हैं।
           
सॉरी सीमा, आज मुझे भी काम है। घर भी थोड़ा जल्दी जाना है। सॉरी आज नहीं।
          
घर जल्दी जाना है? क्यों कोई खास बात है क्या?”
         
नहीं कोई खास बात नहीं। माँजी का व्रत है। उसका थोड़ा सामान बाजार से लेना है। बस और कुछ नहीं।
            
क्यों रेनू, तेरी सास तो दिन भर घर में अकेले ही तो रहती है। वो खुद भी तो ला सकती है।
          
ला तो सकती है, पर जब मैं हूँ तो माँजी को काम करने की क्या जरूरत है। मैं उन्हें इतना भी आराम दे सकूँ तो बेकार है मेरा उनके साथ रहना, फिर तो वे अकेले ही भली हैं।
        
ठीक है रेनू। मैं अपना काम करती हूँ।
        
. के. सीमा, बुरा मत मानना फिर कभी कर दूँगी।

.... जबान पर आकर रुक गया नहीं मन तो कर रहा था कि कह दूँ फैशन-वैशन में तो अव्वल पर काम में मन नहीं लगता। नहीं लगता तो घर बैठ। मैं तेरा काम करूँगी तो अपनी सैलरी मुझे दे देगी क्या। दूसरों की बातों में तो तेरी जान अटकी रहती है। रोज़ एक-एक फाइल भी निपटाती तो मेज पर ढेर नहीं लगता। अब बॉस की डाँट खा, तभी मेरे कलेजे को ठण्डक मिलेगी। बड़ी आई मुझसे काम करवाने वाली-....

रेनू फटाफट अपनी फाइलें निपटाने लग गयी। अभी उसे कुछ लेटर भी टाइप करके प्रिंट आऊट निकालने थे। इन सब कामों में कब चार बज गये पता ही चला। वह फाइलें समेट ही रही थी कि सीमा ने आवाज़ दी।

रेनू टाइम हो गया। क्या आज घर नहीं जाना है? तू तो कह रही थी कि जल्दी जायेगी।
          
बस चल रही हूँ। क्या करूँ यार काम ही इतना था कि जल्दी नहीं हुआ। माँ जी पूजा पर मेरा इंतज़ार कर रही होंगी। अभी फल और पूजा का सामान भी लेना है। माँ जी जरूर परेशान हो रही होंगी कि मैं कहाँ रह गयी।”- रेनू कहते कहते उठ खड़ी हुई।

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