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| 09.07.2007 |
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चाँदनी
धूप अलका चित्राँशी |
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1
जीवन
में
कभी-कभी
ऐसा
समय
भी
आता
है
जब
इंसान
को
परिस्थितिवश
दोहरा
जीवन
जीने
के
लिए
मजबूर
होना
पड़ता
है।
चाह
कर
भी
वो
बातें
ज़ुबान
पर
नहीं
आ
पातीं
जो
मन
में
होती
हैं
और
दूसरों
की
खुशी
की
ख़तिर
वो
सब
कहना
पड़ता
है,
जो
वे
सुनना
चाहते
हैं,
लेकिन
हम
कहना
नहीं
चाहते,
फिर
भी
बोलना
पड़ता
है। यहीं से शुरु होती है रेनू की दोहरी ज़िंदगी जिसे रेनू बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ जी रही है। मन परेशान है पर किसी कोने में आत्मनिर्भर होने की ख़्वाहिश दबी थी, वो आज पूरी हो रही है। रेनू जानती है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है, इसीलिए परेशानी को चेहरे पर फटकने भी नहीं देती चाहो दफ़्तर हो या घर।
रेनू
की
दिनचर्या
सुबह
पाँच
बजे
शुरु
होती
है,
नहा
धो
कर
नाश्ता
बनाना,
सास
को
जगने
पर
चाय
पहुँचाना,
अपना
टिफिन
पैक
करना
सब
उसी
को
करना
पड़ता
है।
मन
तो
नहीं
करता
कि
सुबह
उठकर
वो
सारे
काम
करे,
वो
तो
चाहती
है
कि
उठे
और
नहा
धोकर
जैसे
ही
मेज
पर
आये
लगा-लगाया
नाश्ता
मिले,
जिसे
खाकर
वो
दफ़्तर
निकल
जाये
लेकिन
नौकरी
के
लिए
यह
सब
करना
ही
पड़ता
है।
“माँ
जी
आइये,
चाय
तैयार
है।”
..मन
में
तो
आया
कि
कहे
आ
बुड्ढी
चाय
पी
ले
दिन
भर
पड़े-पड़े
खाट
तोड़ती
रहती
है।
सुबह
समय
से
उठ
नहीं
सकती,
रोज़
चाय
के
लिए
चिल्लाना
पड़ता
है,
बीसों
आवाज़
दूँगी
तब
आयेगी। रेनू केतली से चाय प्याले में डालते हुए मन ही मन बुदबुदा रही थी.. कितनी चतुर है बुढ़िया, मक्खन बहुत मार लेती है। काम कराना तो कोई इससे सीखे। बैठे-बैठे खाने को मिले तो तरीफ़ मारने में जाता ही क्या है। मार बुड्ढी मार, मैं तो काम कर ही रही हूँ। तू आराम कर!
“लीजिए
माँ
जी,
चाय।
माँ
जी
आप
के
लिए
पराँठे
और
मटर
की
सब्जी
बना
दी
है।
अभी
परोस
दूँ
कि
आप
बाद
में
खाएँगी?” |
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