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| 09.07.2007 |
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चाँदनी
धूप अलका चित्राँशी |
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1
जीवन
में
कभी-कभी
ऐसा
समय
भी
आता
है
जब
इंसान
को
परिस्थितिवश
दोहरा
जीवन
जीने
के
लिए
मजबूर
होना
पड़ता
है।
चाह
कर
भी
वो
बातें
ज़ुबान
पर
नहीं
आ
पातीं
जो
मन
में
होती
हैं
और
दूसरों
की
खुशी
की
ख़तिर
वो
सब
कहना
पड़ता
है,
जो
वे
सुनना
चाहते
हैं,
लेकिन
हम
कहना
नहीं
चाहते,
फिर
भी
बोलना
पड़ता
है। यहीं से शुरु होती है रेनू की दोहरी ज़िंदगी जिसे रेनू बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ जी रही है। मन परेशान है पर किसी कोने में आत्मनिर्भर होने की ख़्वाहिश दबी थी, वो आज पूरी हो रही है। रेनू जानती है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है, इसीलिए परेशानी को चेहरे पर फटकने भी नहीं देती चाहो दफ़्तर हो या घर। रेनू की दिनचर्या सुबह |