अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.07.2007
 
चाँदनी धूप
अलका चित्राँशी

1

जीवन में कभी-कभी ऐसा समय भी आता है जब इंसान को परिस्थितिवश दोहरा जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है। चाह कर भी वो बातें ज़ुबान पर नहीं पातीं जो मन में होती हैं और दूसरों की खुशी की ख़तिर वो सब कहना पड़ता है, जो वे सुनना चाहते हैं, लेकिन हम कहना नहीं चाहते, फिर भी बोलना पड़ता है।
ऐसा ही कुछ रेनू के साथ हुआ। सास नहीं चाहती थी कि उनकी बहू नौकरी करे लेकिन रेनू किसी भी शर्त पर यह नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं थी। आखिर रेनू ने अपनी सास को मना ही लिया कि वह घर और दफ़्तर के बीच तालमेल बैठा लेगी और उसकी नौकरी से घर के कामों में कोई भी दिक्कत नहीं आयेगी। अगर उन्हें कभी ऐसा लगे कि वह दफ़्तर की वजह से घर के लिए समय नहीं निकाल पा रही हैं तो वे बेशक उसकी नौकरी छुड़वा दें।

यहीं से शुरु होती है रेनू की दोहरी ज़िंदगी जिसे रेनू बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ जी रही है। मन परेशान है पर किसी कोने में आत्मनिर्भर होने की ख़्वाहिश दबी थी, वो आज पूरी हो रही है। रेनू जानती है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है, इसीलिए परेशानी को चेहरे पर फटकने भी नहीं देती चाहो दफ़्तर हो या घर।

रेनू की दिनचर्या सुबह