अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.07.2007
 
चाँदनी धूप
अलका चित्राँशी

1

जीवन में कभी-कभी ऐसा समय भी आता है जब इंसान को परिस्थितिवश दोहरा जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है। चाह कर भी वो बातें ज़ुबान पर नहीं पातीं जो मन में होती हैं और दूसरों की खुशी की ख़तिर वो सब कहना पड़ता है, जो वे सुनना चाहते हैं, लेकिन हम कहना नहीं चाहते, फिर भी बोलना पड़ता है।
ऐसा ही कुछ रेनू के साथ हुआ। सास नहीं चाहती थी कि उनकी बहू नौकरी करे लेकिन रेनू किसी भी शर्त पर यह नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं थी। आखिर रेनू ने अपनी सास को मना ही लिया कि वह घर और दफ़्तर के बीच तालमेल बैठा लेगी और उसकी नौकरी से घर के कामों में कोई भी दिक्कत नहीं आयेगी। अगर उन्हें कभी ऐसा लगे कि वह दफ़्तर की वजह से घर के लिए समय नहीं निकाल पा रही हैं तो वे बेशक उसकी नौकरी छुड़वा दें।

यहीं से शुरु होती है रेनू की दोहरी ज़िंदगी जिसे रेनू बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ जी रही है। मन परेशान है पर किसी कोने में आत्मनिर्भर होने की ख़्वाहिश दबी थी, वो आज पूरी हो रही है। रेनू जानती है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है, इसीलिए परेशानी को चेहरे पर फटकने भी नहीं देती चाहो दफ़्तर हो या घर।

रेनू की दिनचर्या सुबह पाँच बजे शुरु होती है, नहा धो कर नाश्ता बनाना, सास को जगने पर चाय पहुँचाना, अपना टिफिन पैक करना सब उसी को करना पड़ता है। मन तो नहीं करता कि सुबह उठकर वो सारे काम करे, वो तो चाहती है कि उठे और नहा धोकर जैसे ही मेज पर आये लगा-लगाया नाश्ता मिले, जिसे खाकर वो दफ़्तर निकल जाये लेकिन नौकरी के लिए यह सब करना ही पड़ता है।
आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। रेनू ने केतली में चाय छानी और ट्रे में रख कर डाइनिंग हाल में ले आई। उसने सास को बुलाया-

माँ जी आइये, चाय तैयार है।” ..मन में तो आया कि कहे बुड्ढी चाय पी ले दिन भर पड़े-पड़े खाट तोड़ती रहती है। सुबह समय से उठ नहीं सकती, रोज़ चाय के लिए चिल्लाना पड़ता है, बीसों आवाज़ दूँगी तब आयेगी।
          
ला बहू चाय दे दे!” माँजी ने कहा।
         
आप बैठिए माँजी, लीजिए चाय तो मैंने कप में निकाल दी है।
       माँजी ने चाय पीते हुए कहा, “बेटी तेरे हाथ की बनी चाय में तो जादू है, पीते ही कैसे चुस्ती जाती है! आधा प्याला चाय और देना।

रेनू केतली से चाय प्याले में डालते हुए मन ही मन बुदबुदा रही थी.. कितनी चतुर है बुढ़िया, मक्खन बहुत मार लेती है। काम कराना तो कोई इससे सीखे। बैठे-बैठे खाने को मिले तो तरीफ़ मारने में जाता ही क्या है। मार बुड्‍ढी मार, मैं तो काम कर ही रही हूँ। तू आराम कर!

लीजिए माँ जी, चाय। माँ जी आप के लिए पराँठे और मटर की सब्जी बना दी है। अभी परोस दूँ कि आप बाद में खाएँगी?”
          
अरी बेटी, मैं तो बताना ही भूल गयी थी कि आज मेरा व्रत है। मेरे लिए अभी नाश्ते में मखाने की खीर बना दे, और समय हो तो दोपहर में खाने के लिए कट्टू के आटे की दो पूरी सेंक दे और फलाहारी आलू बना दे। शाम को तो तुम दफ़्तर से ही जाओगी।
         
जी माँ जी अभी बना देती हूँ। कमाल की बुढ़िया है! खा-खा कर ड्रम हुई जा रही है फिर भी एक दिन सब्र नहीं कर सकती। रहेगी व्रत में और तीनों टाइम छक कर खायेगी। उसके बाद भी दर्शायेगी कि व्रत में रह कर कद्‍दू में तीर मार दिया है।

आगे --1, 2, 3



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें