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12.06.2008
 

 मेरा सफ़र
अली सरदार जाफ़री


फिर एक दिन ऐसा आयेगा
आँखों के दिये बुझ जायेंगे
हाथों के कंवल कुम्हलायेंगे
और बर्ग-ए-ज़बां से नतक़-व-सदा
की हर तितली उड़ जायेगी
बर्ग=पत्ता
इक काले समन्दर की तह में
कलियों की तरह से खिलती हुई
फूलों की तरह से हँसती हुई
सारी शक्लें खो जायेंगी
ख़ून की गर्दिश दिल की धड़कन
सब रंगीनियाँ सो जायेंगी
और नीली फ़िज़ा की मखमल पर
हँसती हुई हीरे की ये कनी
ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं
इस की सुबहें इस की शामें
बेजाने हुए बेसमझे हुए
इक मुश्त ग़ुबार-ए-इन्सां पर
शबनम की रो जायेंगी
मुश्त=मुट्ठी; ग़ुबार=खाक
हर चीज़ भुला दी जायेगी
यादों के हसीं बुतख़ाने से
बुतख़ाना=मन्दिर
हर चीज़ उठा दी जायेगी
फिर कोई नहीं ये पूछेगा
‘सरदार‘ कहाँ है महफ़िल में
लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
बच्चों के दहन से बोलूँगा
चिड़ियों की ज़बां से गाऊँगा
दहन=मुँह
जब बीज हँसेंगे धरती में
और कोंपलें अपनी उंगली से
मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी
मैं पत्ती पत्ती कली कली
अपनी आँखें फिर खोलूँगा
सर सब्ज़ हथेली पर लेकर
शबनम के तरे तोलूँगा
मैं रंग-ए-हना आहँग-ए-ज़ल
अन्दाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा
रुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह
हर आँचल से छन जाऊँगा
रंग-ए-हना=मेहँदी का रंग; आहँग-ए-गज़ल=गज़ल का साथ
अन्दाज़-ए-सुख़न=लिखने की शैली
जाड़ों की हवाएँ दामन में
जब फसल-ए-ख़ज़ां को लायेंगी
हरू के जवां कदमों के तले
सूखे हुए पत्तों से मेरे
हँसने की सदाएँ आयेंगी
फसल-ए-ख़ज़ां=पतझ ऋतु
धरती की सुनहरी सब नदियाँ
आकाश की नीली सब झीलें
हस्ती से मेरी भर जायेंगी
और सारा ज़माना देखेगा
हर क़िस्सा मेरा अफ़्साना है
हर आशि है सरदार यहाँ
हर माशूका सुल्ताना है
मैं एक गुरेज़ां लम्हा हूँ
अय्याम के अफ्सूंखाने में
मैं एक तड़पता क़तरा हूँ
मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता हूँ
माज़ी की सुराही के दिल से
मुस्तक़्बिल के पैमाने में
गुरेज़ां लम्हा=बीतता हुआ क्षण; अय्याम=जीवन,समय; मसरूफ-ए-सफ़र=यात्रा में व्यस्त
माज़ी=बीता हुआ समय; मुस्त
क़्बिल=भविष्य
मैं सोता हूँ और जागता हूँ
और जाग के फिर सो जाता हूँ
सदियों का पुराना खेल हूँ मैं
मैं मर के अमर हो जाता हूँ


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