| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 12.06.2008 |
|
ग़म का सितारा |
|
मेरी वादी में वो इक दिन यूँ ही आ निकली थी महफ़िल-ए-शौक़ में इक धूम मचा दी उस ने शोला-ए-इश्क़ सर-ए-अर्श को जब छूने लगा और अब मेरे तसव्वुर का उफ़क़ रोशन है |
|
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|