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ISSN 2292-9754

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03.24.2017


जवानी और बुढ़ापा
लेखक - डॉ. मोहम्मद युनूस बट
अनुवाद - अख़तर अली

पहले बुढ़ापा कलात्मक होता था आज कल भयानात्मक होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप बुढ़ापे की दुनियां मैं जवानी के कौन से रास्ते से दाख़िल हुए हैं। विशेषज्ञों ने दावा किया है कि 2035 तक देश में बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी। अब ये तो दुनियां का नियम है कि यहाँ अगर कोई चीज़ बहुत ज़्यादा मात्रा में है तो उसकी क़ीमत बहुत कम हो जाती है। कालेज के प्रोफ़ेसर ने पाँच लड़कों को कक्षा में खड़ा किया और कहा - तुम चार लड़कों के दिमाग़ की क़ीमत पाँच सौ रुपये प्रति ग्राम और मेरे से कहा - तुम्हारे दिमाग़ की क़ीमत ड़बल यानी हज़ार रुपये प्रति ग्राम है। अपने दिमाग़ क़ीमत जान कर मैं पूरी तरह ख़ुश हो भी नही पाया था कि प्रोफ़ेसर साहब ने बताया कि जो वस्तु बहुत कम मात्रा में पाई जाती है उसकी क़ीमत हमेशा बहुत अधिक होती है। मुझे लगता है बूढ़ों की बढ़ती तादाद से उनकी मार्केट वैल्यू एकदम घट जायेगी । जनसंख्या रोकने के तरीक़े ढूँढ़ निकाले बुढ़ापा रोकने का कोई उपाय नहीं है। अब जब चारों तरफ़ बूढ़े ही बूढ़े हो जायेंगे तो उन्हें बूढ़ा समझ उनकी इज़्ज़त कौन करेगा?

बूढ़ों को हमारे समाज में वही स्थान प्राप्त है जिस स्थान पर वह बैठे रहते हैं। हम बूढ़ों के ख़िलाफ़ नहीं क्योंकि हमें भी एक दिन बूढ़ा होना है लेकिन बूढ़े हमारे ख़िलाफ़ रहते हैं क्योंकि उन्हें अब कौन सा जवान होना है?

हमारे यहाँ बूढ़े नसीहत देने के काम आते हैं। एक बूढ़े ने बच्चे को नसीहत देते हुए कहा - बेटे अपनी बाईक की रफ़्तार उतनी ही रखना जितनी मेरी दुआओं की रफ़्तार है यानी चालीस किलो मीटर प्रति घंटा, ये उनकी दुआओं की रफ़्तार है, नसीहतों की रफ़्तार बाईक की रफ़्तार जैसी है।

बूढ़े हमेशा ये सोच कर परेशान रहते हैं कि नई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी? वह भी यही सोच कर परेशान रहेगी कि ऩई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी?

एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पच्चीस प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि बूढ़े एकदम खाली रहते हैं जबकि तीन प्रतिशत बूढ़े भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं उन सब का कहना है कि हमारे पास पल भर की भी फ़ुरसत नही है। दरअसल जवान जिस काम को पाँच मिनट में कर के दिन भर खाली बैठे रहते हैं, बूढ़े उसी पाँच मिनट के काम को करने में पूरा दिन लगा देते हैं लिहाज़ा उनके पास पाँच मिनट का भी टाईम नहीं होता। बुढ़ापे की बस एक ही बीमारी है और वह है बुढ़ापा और बुढ़ापे के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

बुढ़ापे में अक्सर भूल जाने की आदत होती है। तीन बूढ़े आपस में बात कर रहे थे, एक ने कहा - जब मैं सीढ़ियों के बीच में पहुँचता हूँ तब भूल जाता हूँ कि मेरे को चढ़ना है या उतरना, दूसरे ने कहा - जब मैं फ्रिज खोलता हूँ तो भूल जाता हूँ कि मेरे को कुछ रखना है या निकालना है, तीसरे ने कहा - मैं कभी कभी यही भूल जाता हूँ कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। वैसे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि आप किसी भी बूढ़े को झाड़ेंगे तो उसमें से एक जवान आदमी निकलेगा।

कहते है स्वर्ग में कोई बूढ़ा नहीं होता और अगर यहाँ बूढ़ों की संख्या बढ़ती गई तो फिर इस देश के स्वर्ग बनने की कोई संभावना नहीं रहेगी।

अब जो लोग कहते हैं कि 2035 तक बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जायेगी उन्हें मैं ये भी बता दूँ उस वक़्त जो बूढ़े होंगे वो बुढ़ापे की सभी परिभाषायें बदल देंगे क्योंकि उस वक़्त हम बूढ़े होंगे।

एक बात और बुढ़ापे की सभी बातें बूढ़े पुरुषों के बारे में ही होती हैं बूढ़ी औरतों के बारे में नहीं, क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती।


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