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ISSN 2292-9754

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04.13.2017


वापसी

मैं बरसों बाद अपने शहर में
क्या ढूँढने आया हूँ वापिस
मगर यह शहर अब मेरा नहीं है

जहाँ पुरखों का घर था
अब वहाँ भद्दी सी इक ऊँची इमारत बन चुकी है
गली के छोर पर जो खेल का मैदान था
उसे घटिया सी शॉपिंग माल ने हथिया लिया है
सड़क के पार कुछ पेड़ों के झुरमुट थे
वो अब दिखते नहीं हैं
सभी पगडंडियाँ जो स्कूल ले जाती थीं
गायब हो गई हैं
वहाँ बस झुग्गियाँ ही झुग्गियाँ हैं
जहाँ पर स्कूल था
अब उस जगह बस एक खंडहर सा खड़ा है
यह स्कूल सरकारी था
और अब ऐसे स्कूलों में कोई पढ़ने नहीं जाता
यहाँ जल्दी ही क्रिकेट स्टेडियम बनने की ख़बरें हैं

मेरी पहचान के सब चिन्ह मिटते जा रहे हैं
मैं अपने ही शहर में जैसे इक खोया मुसाफ़िर हूँ
यहाँ कोई नहीं ऐसा
जो मेरे नाम से परिचित
मुझे पहचानता हो


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