अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.13.2018


रोज़ पढ़ता हूँ भीड़ का चेहरा

रोज़ पढ़ता हूँ भीड़ का चेहरा
सब के चेहरों पे एक सा चेहरा

मुद्दतों बाद उस को देखा था
उस के चेहरे पे था नया चेहरा

आइने में नज़र नहीं आता
गुम कहाँ हो गया मेरा चेहरा

कुछ नए लोग आएँगे मिलने
तुम भी ले जाओ इक नया चेहरा

उस का चेहरा लिबास था उसका
बदला मौसम बदल गया चेहरा

आइना देख कर परेशाँ हूँ
किस का चेहरा है ये मेरा चेहरा

इक खुली सी किताब था पहले
क्यूँ पहेली है अब तेरा चेहरा

साफ़ शफ़्फ़ाफ़ आइना उसका
गर्द आलूद ये मेरा चेहरा


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें