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ISSN 2292-9754

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01.31.2017


कभी तो अपनी हद से निकल

कभी तो अपनी हद से निकल
आ तू मेरे साथ भी चल

पानी में आ कर भी देख
न सूरज की धूप में जल

दे उस को आवाज़ तो दे
उस की गली से यूँ न निकल

कुछ नुक्सान तो लाज़िम था
उस की फ़ितरत मेरा दिल

कौन है तेरे साथ न देख
चल तू अपनी राह पे चल

दुनिया की रफ़्तार न देख
तू ख़ुद अपनी चाल बदल

देख उस को इल्ज़ाम न दे
सोच तू उस का रध-ए-अमल


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