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ISSN 2292-9754

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02.10.2016


फैलाने दो पंख मुझे

फैलाने दो पंख मुझे,
कि अब उड़ना चाहता हूँ,
बैठ लिया डर कर बहुत,
कि अब जीना चाहता हूँ।

घूमने दो इस जग को मुझे,
बाँधो ना सीमाओं में,
बहुत रुक चुका इंतज़ार में,
अब आगे बढ़ने दो।

बीत गया है समय बहुत,
काम अभी है बाक़ी,
जाना है दूर बहुत,
अब बस मुझको चलने दो।

जीवन में खोया बहुत,
अब पाने की इच्छा है,
मेहनत से डरता नहीं,
इरादा मेरा पक्का है।

लौट के फिर मैं आऊँगा,
जीत कर लक्ष्य सभी,
पंछी जैसे लौटते हैं,
रात को अपने घर सभी।।


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