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06.07.2008
 

मातृत्व
आकांक्षा यादव


उसके आने के अहसास से
सिहर उठती हूँ
अपने अंश का
एक नए रूप में प्रादुर्भाव
पता नहीं क्या-क्या सोच
पुलकित हो उठती हूँ
उसकी हर हलचल
भर देती है उमंग मुझमें
           बुनने लगी हूँ अभी से
           उसकी ज़िन्दगी का ताना-बाना
                          शायद मातृत्व का अहसास है।


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