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| 01.16.2009 |
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माँ का मर्म |
“बधाई
हो! घर में लक्ष्मी आई है”,
कहते हुए नन्हीं सी बिटिया को दादी की गोद में देते हुए नर्स बोली।
हुँह..... क्या खाक बधाई। पहली ही बहू के पहली संतान वो भी लड़की
हुई और वो भी सिजेरियन...... कहते हुए उन्होंने मुँह फेर लिया और उस नन्हीं
सी जान को स्नेह की एक बूँद भी बरसाने की जरूरत नहीं समझी प्रीती की सासू
माँ ने। जल्द ही अपनी गोद हल्की करते हुए बच्ची को बढ़ा दिया अपने बेटे की
गोद में।
रवि को तो
जैसे सारा जहां मिल गया अपने अंश को अपने सामने पाकर। पिछले नौ महीने कितनी
कल्पनाओं के साथ एक-एक पल रोमांच के साथ बिताया था प्रीती और रवि ने। खुशी
के आँसू के साथ दो बूँदें टपक पड़ीं उस नन्ही सी बिटिया पर।
कुछ दिनों
के अंतराल पर अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद जब घर जाने की तैयारी हुई
तो प्रीती फूले न समा रही थी। पिछले नौ महीनों से जिस घड़ी की इंतज़ार वह कर
रही थी,
आज
आ ही गई। अपनी गोद भरी हुई पाकर जब प्रीति ने घर में प्रवेश किया तो मारे
खुशी के उसके आँसू बहने लगे। वह इस खुशी के पल को सँभालने की कोशिश करने
लगी। हँसते-खेलते ग्यारह दिन कैसे बीत गये,
पता ही नहीं चला। लेकिन सासू माँ का मुँह टेढ़ा ही बना रहा। प्रीति चाहती थी
कि दादी का प्यार उस नन्हीं सी जान को मिले,
लेकिन उसकी ऐसी किस्मत कहाँ
?
खैर,
जब
बारहवें दिन बरही-रस्म की बात आयी तो सासू माँ को जैसे सब कुछ सुनाने का
अवसर मिल गया और इतने दिन का गुबार उन्होंने एक पल में ही निकाल
लिया......कैसी बरही,
किसकी बरही,
बिटिया ही तो जन्मी है। हमारे यहाँ बिटिया के जन्म पर कोई रस्म-रिवाज़ नहीं
होता.... कौन सी खुशी है जो मैं ढोल बजाऊँ,
सबको मिठाई खिलाऊँ.... कितनी बार कहा था जाँच करा लो,
लेकिन नहीं माने तुम सब। लो अब भुगतो,
मुझे नहीं मनाना कोई रस्मोरिवाज़......।
सासू माँ
की ऐसी बात सुनकर प्रीति का दिल भर आया। रुँधे हुए गले से बोली,
“सासू
माँ! आज अगर यह बेटी मेरी गोद में नहीं होती तो कुछ दिन बाद आप ही मुझे
बाँझ कहती और हो सकता तो अपने बेटे को दूसरी शादी के लिए भी कहती जो शायद
आपको दादी बना सके,
लेकिन आज इसी लड़की की वजह से मैं माँ बन सकी हूँ। यह शब्द एक लडकी के जीवन
में क्या मायने रखता हैं,
यह
आप भी अच्छी तरह जानती हैं। आप उस बाँझ के या उस औरत के दर्द को नहीं समझ
सकेंगी,
जिसका बच्चा या बच्ची पैदा होते ही मर जाते हैं। ये तो ईश्वर की दया है
सासू माँ,
कि
मुझे वह दिन नहीं देखना पड़ा। आपको तो खुश होना चाहिए कि आप दादी बन चुकी
हैं,
फिर चाहे वह एक लड़की की ही। आप तो खुद ही एक नारी हैं और लड़की के जन्म
होने पर ऐसे बोल रही हैं। कम से कम आपके मुँह से ऐसे शब्द नहीं शोभा देते
सासू माँ।”
इतना कहते ही इतनी देर से रोके हुए आँसुओं को और नहीं रोक सकी प्रीती।
प्रीती की
बातों ने सासू माँ को नयी दृष्टि दी और उन्हें अपनी बातों का मर्म समझ में
आ गया था। उन्होंने तुरन्त ही बहू प्रीती की गोद से उस नन्हीं सी बच्ची को
गोद में ले लिया और अपनी सम्पूर्ण ममता उस पर न्यौछावर कर उसको आलिंगन में
भर लिया।
शायद उन्होंने इस सत्य को स्वीकार लिया कि लड़की भी तो ईश्वर की ही सृष्टि है। जहाँ पर नवरात्र के पर्व पर कुंवारी कन्याओं को खिलाने की लोग तमन्ना पालते हैं, जहाँ दुर्गा, लक्ष्मी, काली इत्यादि देवियों की पूजा होती है, वहाँ हम मनुष्य ये निर्धारण करने वाले कौन होते हैं कि हमें सिर्फ लड़का चाहिए, लड़की नहीं। |
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