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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


आलसी हम

रागिनी फिर मुस्कायी
किरणों की बात छिड़ी थी,
लाल हुए अम्बर पर
सूरज की धाक बड़ी थी,
कोपलों में रस रंग भर,
अलसाते को थोड़ा तंग कर,
भोरों औ’ विहगों की टोली,
कौवों संग कोयल की बोली
प्रातः काल ले आई थी,
पेड़ों से छनती धूप मिली तो
धरती थोड़ी गर्माई थी,
हम अधमुँदी आँखों को मसले
गर्म चाय की चुस्की ले
किसी और दुनिया में खड़े थे
जड़ता से जड़, टीवी रिमोट के साथ
तब भी बिस्तर पर पड़े थे।


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