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10.31.2007
 
मेला
अजय कुमार पिल्लई

चाहतों ने सजाया है मेला
मन की उड़ान और फैलाव
नजरों में समेटने की
तमाम कोशिश
बच्चों ने भी
बसाया है मेला
अंगुलियाँ थामे
पैरों का रेला,
सामान समेटे
बिखर रहा था मैं
स्टॉल-दर-स्टॉल पर
कान लगाए
हाँ, नहीं के सवाल उलझाएँ,
कशमकश
खुशी का सौदा है,
मुस्कुरा कर लूटना है
हद यह है
कि जीतने के दावे
दोनों ने किये हैं
हार तो
उस अँधेरे कोने की हुई
जहाँ
मिट्टी के खिलोने वाला खड़ा था।


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