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10.31.2007
 
दर्पण
अजय कुमार पिल्लई

मैंने हर ओर देखा है
पल-पल
मुखौटे उतारता रहा
तलाशता रहा
नज़र-नज़र
दर्पण झूठ ना बोले
मैं वहाँ नहीं था
अक्ष दर अक्ष
प्याज़ की परतों सी
खुलती रही सीमा
समय की
निभाये हैं बंधन रिश्तों के
शहर, घर-घर,
बदलता रहा मंज़र
पर न सका संभल
आसमां और एक गुज़रा है
टिमटिमाती रोशनी
तारों की
इधर-उधर
अंधेरे स्याह में पाया
अपने को
बन्द आँखों में
मैंने
रोशन जहाँ पाया
मैं वहीं था....वही था।


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