जुगाड़
इक
नई
तेहज़ीब
की
अलामत
है
बिना
जुगाड़
के
जीना
यहाँ
क़यामत
है
जुगाड़
है
तो
चमन
का
निज़ाम
अपना
है
जुगाड़
ही
को
हमेशा
सलाम
अपना
है
जुगाड़
दिन
का
उजाला
है
रात
रानी
भी
जुगाड़
ही
से
हुकूमत
है
राजधानी
भी
जुगाड़
ही
से
मोहब्बत
के
मेले
ठेले
हैं
बिना
जुगाड़
के
हम
सब
यहाँ
अकेले
हैं
जुगाड़
चाय
की
प्याली
में
जब
समाती
है
पहाड़
काट
के
ये
रास्ते
बनाती
है
जुगाड़
बन्द
लिफाफे
की
इक
कशिश
बन
कर
किसी
अफसर
किसी
लीडर
को
जब
लुभाती
है
नियम
उसूल
भी
जो
काम
कर
नहीं
पाते
ये
बैक
डोर
से
वो
काम
भी
कराती
है
जुगाड़
ही
ने
तो
रिश्वत
पे
दिल
उछाला
है
जुगाड़
ही
से
कमीशन
का
बोल
बाला
है
जुगाड़
एक
ज़ुरूरत
है
आदमी
के
लिये
जुगाड़
रीढ़
की
हड्डी
है
ज़िन्दगी
के
लिये
मैं
दूसरों
की
नहीं
अपनी
तुम्हें
सुनाता
हूँ
जुगाड़
ही
की
बदौलत
यहाँ
पे
आया
हूँ
जुगाड़
क्या
है
जो
पूछोगे
हुक्मरानों
से
यही
कहेंगे
वो
अपनी
दबी
जबानों
से
जुगाड़
से
हमें
दिल
जान
से
मोहब्बत
है
जुगाड़
ही
की
बदौलत
मियां
हकूमत
है
जहाँ
जुगाड़
ने
अपना
मिजाज़
बदला
है
नसीब
कौम
का
फूटा
समाज
बदला
है
जुगाड़
ही
ने
बिछाए
हैं
ढेर
लाशों
के
जुगाड़
ही
ने
तो
छीने
हैं
लाल
माओं
के
हमें
जुगाड़
से
जुल्मों
सितम
मिटाना
है
खुलूस
प्यार
मोहब्बत
के
गुल
खिलाना
है
करो
जुगाड़
खुलुसो
वफ़ा
के
दीप
जलें
करो
जुगाड़
कि
फिर
अमन
की
हवाएँ
चलें
करो
जुगाड़ के
सिर
से
कोई
चादर
न
हटे
करो
जुगाड़ के
औरत
की
आबरू
न
लुटे
करो
जुगाड़
के
हाथों
को
रोज़गार
मिले
मेहक
उठे
ये
चमन
इक
नई
बहार
मिले
करो
जुगाड़
नया
आसमाँ
बनाएँ
हम
कबूतर
अमन
के
फिर
से
यहाँ
उड़ाएँ
हम
तो
आओ
मिले
इसी
को
सलाम
करते
है
जुगाड़
की
यही
तेहज़ीब
आम
करते
हैं।