अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
07.06.2007
 
हँसी-घरों में वो शीशे दिखाई देते हैं
अहमद रईस निज़ामी

हँसी-घरों में वो शीशे दिखाई देते हैं
जहाँ पे बौने भी लम्बे दिखाई देते है

हमारी घात में बैठे दिखाई देते हैं
हर एक मोड़ पे कुत्ते दिखाई देते हैं

मैं राजनीति का लेता हूँ जायज़ा जिस दम
लिबास वाले भी नंगे दिखाई देते हैं

शरारतों का वो तूफ़ान लेके चलते है
किसी
शरीफ़ के बेटे दिखाई देते हैं

ये कुर्सियों से चिपक कर जराईम पेशा भी
बड़े शरीफ़ और सच्चे दिखाई देते है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें