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04.28.2007
 

पतझड़
डॉ. (श्रीमती) एग्नेस ठाकुर


वक्‍त के कठोर कदम,
भाव सुमनों को -
कुचलते रहे ..........।
पथराई आँखें,
किस्मत का तमाशा--
देखती रही.........।
आँखों के आँसू,
सावन के मेघों की भाँति -
बरसते रहे........।
जीवन के सपने -
पतझड़ के पत्तों की भाँति -
बिखरते रहे ........।
मन रीता,
ठूँठ की भाँति -
बिलखता रहा ..........।
इसी तरह,
सारा जीवन
गुजरता रहा..........।

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