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06.25.2007
 

शायद अभी है राख में कोई शरार भी
दा ज़ाफ़री


शायद अभी है राख में कोई शरार भी
क्यों वर्ना इन्तज़ार भी है इज्तयार भी

शरार= चिंगारी; इज्तयार= बेचैनी

ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का
मिलने को मिल गया है सुकूँ भी क़रार भी

मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद= असफल/भाग्यहीन दिल की मृत्यु
सुकूँ = शान्ति; क़रार= आराम

अब ढूँढने चले हो मुसाफर को दोस्त
हद्द-ए-निगाह तक न रहा जब ग़ुबार भी

हद्द-ए-निगाह= दृष्टि की सीमा

हर आस्तां पे नासिया-फ़र्सा हैं आज वो
जो कल न कर सके थे तेरा इन्तज़ार भी

आस्तां= दहलीज़; नासिया-फ़र्सा= माथा रगड़ने वाला

इक राह रुक गयी तो ठिठक क्यों गयी अदा
आबाद बस्तियाँ हैं पहाड़ों के पार भी



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