| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 06.25.2007 |
|
न ग़ुबार में न गुलाब में मुझे देखना
किसी वक्त शाम मलाल में मुझे सोचना
किसी धुन में तुम भी जो बस्तियों को त्याग दो
किसी रात माह-ओ-नजूम से मुझे पूछना
इसी दिल से हो कर गुज़र गए कई कारवां
मैं न मिल सकूँ भी तो क्या हुआ कि फसाना हूँ
मेरे ख़ार ख़ार सवाल में मुझे ढूँढना
मेरे आँसूओं ने बुझाई थी मेरी तश्नगी
वही इक लम्हा दीद था कि रुका रहा
जो तड़प तुझे किसी आईने में न मिल सके |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|