अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
11.06.2016


बदस्तूर

मेरे इश्क़ का मसला ये तमाम हुआ,
मैं हुआ, बदनाम सरेआम हुआ।

मुद्दतों बाद कोई नज़र आया,
मैं हुआ, गुल-ए-गुलफाम हुआ।

उन्होंने बाज़ार में मेरी क़ीमत जो पूछी,
मैं हुआ, भरे बाज़ार शर्मशार हुआ।

तोड़ा दिल उन्होंने काँच से कुरेद के,
बेवफ़ा मैं ही साबित उस बार हुआ।

रस्म-ए-उल्फ़त को निभाया मैंने,
गलीज़ ज़ुम्बिशों का शिकार हर बार हुआ।

गलीज़ - असभ्य, गन्दा
ज़ुम्बिश - हरकत, गति


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें