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ISSN 2292-9754

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02.06.2015


विसंगतियाँ

विसंगतियाँ
बदलाव के लिए
ज़बर्दस्त माँग हैं
हवा-पानी की तरह,
उन्हें पलने दो।
अँधेरा अवश्य मिटेगा,
एक दीया तो जलने दो।


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