अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.23.2017


महिला संपत्ति अधिकार का हनन कब तक?

भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। भारतीय समाज अलग-अलग आधारों पर अलग अलग भागों में बँटा हुआ है। कहीं क्षेत्र के आधार पर, कहीं जाति के आधार पर, इन अलग अलग हिस्सों में बँटे हुए समाज के अंदर अगर हम झाँकें तो हमें इसमें टकराव और बिखराव साफ़ दिखाई देगा। इस भारतीय समाज को अगर हम स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्थिति बहुत गंभीर नज़र आती है। हम सभी जानते हैं कि हमारे आधुनिक भारतीय समाज में स्त्री की शुरू से ही क्या स्थिति रही है और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है। धार्मिक मुद्दों से लेकर सामाजिक मुद्दों तक सभी में विद्वानों और दार्शनिकों ने स्त्री को एक गंभीर विषय के रूप में चिह्नित किया है। हम स्त्री को अपने समाज देश आदि के विकास से जोड़ कर देखते हैं। हमेशा से यह कहा जाता रहा है कि स्त्री का विकास देश का और समाज का विकास है। मगर सच तो यह है कि यह सब किताबों में लिखी गई, फ़िल्मों में दिखाई गई और कहानियों में कही गई बाते हैं। आज के समाज की सच्चाई इन सबसे बिलकुल उलट है। वर्तमान समय में स्त्री की स्थिति बेहद दयनीय है। स्त्री की इस दयनीय स्थति के पीछे कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं जैसे घरेलू हिंसा, दहेज़ उत्पीड़न, बाल विवाह आदि। यह कुछ ऐसे कारण हैं जिससे समाज में हर वर्ग की स्त्री प्रभावित है। इसके अलावा महिला या स्त्री के लिए संपत्ति का अधिकार भी एक ऐसा विषय रहा है जिस पर देश में लम्बे समय तक चर्चा की जाती रही है। जैसा कि शुरू में ही स्पष्ट किया गया कि भारतीय समाज विविधताओं से भरा हुआ है। विभिन्न प्रकार के धर्म, जाति, क्षेत्र आदि के आधार पर बँटा हुआ है। इसलिए भारत में महिलाओं के लिए संपत्ति का अधिकार धार्मिक भावनाओं, रूढ़ियों और उनकी पुरानी मान्यताओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है। अथार्त अलग-अलग धर्म की स्त्रियों लिए क़ानून में अलग-अलग प्रावधान हैं। मनुष्य के लिए धर्म से पहले मानवता है या यूँ कहें कि मानवता हमारे लिए सबसे बड़ा धर्म है। इसलिए धार्मिक आधार से हटकर मानवता के आधार पर स्त्री के लिए संपत्ति का अधिकार से संबंधित बात करना अधिक महत्वूर्ण है। संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर आँकड़ों पर दृष्टि डालें तो सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज़ की 2016 की रिपोर्ट1 के अनुसार देश में महिलाएँ 56.8 प्रतिशत भूमिहीनता का शिकार हैं। वहीं दूसरी ओर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम राज्य में महिलाएँ सबसे अधिक भूमिहीनता का शिकार हैं। भूमि संपत्ति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखती है इसलिए यहाँ पर महिलाओं के भूमिहीनता के आँकड़ों को दिखाना आवश्यक है। सर्वे के अनुसार2 सिक्किम राज्य में 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं की कुल आबादी की 24.8 प्रतिशत महिलाओं के पास ही भूमि है मतलब 75 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ भूमिहीन हैं। इसमें शहरी इलाक़ों में रहने वाली महिलाओं का प्रतिशत 19.4 है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं का प्रतिशत 28.5 है जिनके पास अपनी स्वयं की भूमि है। अच्छी बात यह है कि मणिपुर सर्वे में 69.9 प्रतिशत के हिसाब से सबसे शीर्ष पर है जहाँ महिलाओं के पास अपनी स्वयं की भूमि है। मणिपुर में लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं के भूमि पर अधिकार को देख कर यह उम्मीद की जा सकती है कि धीरे-धीरे हालात सुधर सकते हैं। यह प्रतिशत महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की ओर एक संकेत देता है।

जब तक देश में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं था तब तक उनके लिए आवाज़ें उठती रहीं मगर जहाँ दूसरी ओर उन्हें संपत्ति का अधिकार प्राप्त हुआ, उनके अधिकारों का हनन किया जाने लगा। कहने का तात्पर्य यह है कि महिला की स्थिति ज्यों की त्यों ही रही। हम आये दिन समाज में ऐसी घटनाओं से रू-बा-रू होते रहते हैं जिनमें किसी बेटे द्वारा अपनी बूढ़ी माँ को घर से निकाल दिया जाता है या पति द्वारा पत्नी को या सास द्वारा बहू को या बहू द्वारा बूढ़ी सास को आदि। यह ऐसी घटनाएँ हैं जिन पर ध्यान देने से स्पष्ट होता है कि महिला संपत्ति अधिकारों का सबसे अधिक हनन घरेलू हिंसा और पारिवारिक झगड़ों के कारण होता है। अप्रैल 2017 में घटित एक दूसरी घटना बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले के मंसूरपुर गाँव की है। इसमें 43 वर्षीय सायदा खातून को उसके पति निजामुद्दीन ने पिटाई कर के संपत्ति से बेदख़ल करते हुए घर से निकाल दिया।3 सायदा का आरोप है कि पति ने दूसरी शादी की है और पति के अलावा उसके ससुराल वाले भी उसको प्रताड़ित करते हैं।  संपत्ति से बेदख़ल सायदा ख़ातून अब दर दर भटक रही है। महिला के संपत्ति अधिकारों का हनन करने की घटनाएँ समाज में अब आम हो गई हैं। मई 2017 में हरयाणा के रोहतक ज़िले में इसी प्रकार की एक घटना सामने आयी, घटना ये है कि धोबी मोहल्ला निवासी एक महिला को उसकी सास नीलम ने यह आरोप लगाते हुए संपत्ति से बेदख़ल कर दिया वह उसे तंग करती है।4 इसके अलावा सितम्बर 2016 में घटित एक अन्य घटना बिहार के नालंदा से सबंधित है। नालंदा ज़िले के मोहनपुर गाँव की निवासी खुशबू को संपत्ति से इसलिए बेदख़ल कर दिया गया क्योंकि उसकी संतानो में अभी तक बेटा नहीं हुआ है। उसकी पहले से ही तीन बेटियाँ हैं। परिवार वालों ने उसके सभी ज़ेवर, भूमि में अधिकार, और मकान में हिस्से को हड़प लिया। खुशबू सायदा खातून की तरह ही अब दर-दर भटकने को मजबूर हैं।5 इन घटनाओं से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आज महिला संपत्ति अधिकार का हनन छोटी से छोटी बात को लेकर किया जाता है। भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से ही बेहतर नहीं है। महिला सशक्तिकरण का प्रतिशत बहुत काम है और ऐसे में जब महिलाओं के साथ ऐसी घटनाएँ होती हैं तो महिला स्वयं को पहले से और अधिक कमज़ोर महसूस करती है। महिलाओं के साथ लिंगभेद एक अलग विषय है मगर आश्चर्जनक बात ये है की वर्तमान में लिंगभेद को लेकर महिला संपत्ति अधिकार का हनन हो रहा है। नालंदा निवासी खुशबू की कहानी इसका स्पष्ट उदाहरण है। हम इन उदाहरण से समझ सकते हैं कि अनेक एक से अधिक विवाह, घरेलू हिंसा, लिंगभेद आदि आज महिला संपत्ति अधिकार के हनन के बड़े कारण हैं। भारतीय समाज में पारिवारिक व्यवस्था ऐसी है कि उसमे बेटों को हमेशा से बड़ा समझा जाता है, या यूँ कहें कि लिंगभेदी मानसिकता है । हिन्दू परिवारों में पहले बेटियों को संपत्ति में हिस्सेदारी का कोई हक़ नहीं दिया जाता था जिससे बेटियाँ समाज में उपेक्षित महसूस करती थीं और अपने अधिकारों से वंचित हो जाती थीं। सर्वप्रथम देश के दो राज्य कर्नाटक और महाराष्ट्र में वर्ष 1994 में महिलाओं को पुरुष के बराबर संपत्ति देने की पहल शुरू की गई। बाद में इसे पूरे देश में लागू किया गया। हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 से 2005 में हुए बदलाव से अब बेटियों को भी संपत्ति में बेटों के बराबर का हक़ दिया गया है। यह विविधताओं से भरे भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग के लिए सकारात्मक सन्देश है।

अपने देश में यह हमेशा से होता आया है कि महिला को संपत्ति से वंचित रखा गया है। समय-समय पर महिलाओं से जब भी संपत्ति के लिए आवाज़ उठाई तो उन पर भिन्न-भिन्न प्रकार से अत्याचार किये जाते रहे हैं। हमारे समाज में हमेशा से ही संपत्ति पर पुरुषों का एकाधिकार माना जाता रहा है। यहाँ तक कि महिला को पुरुष की संपत्ति के रूप में देखा गया है। इस प्रकार की घटनाएँ हमारे समाज में पितृसत्तात्मक सोच को दर्शाती हैं। हमारा देश आज बैलगाड़ी के युग से निकल कर परमाणु युग में प्रवेश कर चुका है। हम अंतरिक्ष की गहराईयों को चीर कर मंगल ग्रह तक पहुँचने में कामयाब हुए मगर इन सबके बावजूद हम पितृसत्तात्मक मानसिकता के शिकार हैं। हम इस मानसिकता को तोड़ कर इससे बाहर निकलने में इतने असमर्थ क्यों हैं? समाज में पुरुष प्रधान सत्ता ने हमेशा ही महिलाओं को दबाया और उनका शोषण किया है। ग़ौर से देखा जाए तो समस्या की सारी जड़ पितृसत्तात्मक मानसिकता है।6 इस पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण ही नारी नारियों और पुरुष पुरुषों पर अत्याचार करता है। उनका शोषण करता है। इससे स्पष्ट है कि पुरुष प्रधान मानसिकता से कहीं अधिक हानिकारक पितृसत्तात्मक मानसिकता है। कई मायनों में तो यह पितृसत्तात्मक मानसिकता पुरुष प्रधान समाज को बढ़ावा देती है। महिला के अधिकारों का हनन करने में पितृसत्तात्मकता का बड़ा हाथ है। मगर अब भी हमारे सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हुआ है कि क्या विविधताओं से भरे भारतीय समाज में जहाँ पितृसत्तात्मक मानसिकता ने अपनी मज़बूत जड़ें जमा ली हैं जो पुरुष प्रधान समाज को बढ़ावा देती है, क्या महिलाओं को उनके अधिकार दे पाएगी? अगर समाज महिलाओं को उसके अधिकार नहीं दे सकता तो अब स्वयं महिलाओं को इसके लिए आगे आना होगा और अपने हक़ की लड़ाई लड़नी होगी। महिलाओं को चाहिए कि वह उनसे अपने अधिकारों को छीन कर ले लें जो उनके अधिकारों का हनन करते हैं।

स्रोत्र /सन्दर्भ सूची

1. सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज़ की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार देश में महिलाएँ…http://bit.ly/2rEpfNt 
2. सर्वे के अनुसार सिक्किम राज्य में 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं की कुल आबादी की 24.8 प्रतिशत महिलाओं के पास… http://rchiips.org/nfhs/factsheet_NFHS-4.shtml
3. 2017 में घटित एक दूसरी घटना बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले के मंसूरपुर गाँव की है। इसमें 43 वर्षीय सायदा खातून को उसके पति… http://bit.ly/2sG1oLT 
4. मई 2017 में हरयाणा के रोहतक ज़िले में इसी प्रकार की एक घटना सामने आयी, घटना ये है कि धोबी मोहल्ला निवासी एक महिला को… http://bit.ly/2sGfpZJ 
5. इसके अलावा सितम्बर 2016 में घटित एक अन्य घटना बिहार के नालंदा से सबंधित है। नालंदा ज़िले के मोहनपुर गाँव की निवासी खुशबू को संपत्ति से इसलिए बेदख़ल… http://bit.ly/2r4XZZK 
6. गौर से देखा जाए तो समस्या की सारी जड़ पितृसत्तात्मक मानसिकता है। इस पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण ही… http://bit.ly/2sG2ash http://bit.ly/2rDYVCY


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें