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12.31.2008
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चक्रव्यूह का अंतिम द्वार
अभिमन्यु


यह ताजा घटना अपने अस पास की है। एक ड्राईवर जो कि कांट्रेक्ट की गाड़ी चलाता है पिछले सात दिनों से लगातार गाड़ी चला रहा था। वह अपनी पीड़ा कई लोगों से कह चुका था। मुझ से भी उसने कही। मैंने उसके ठेकेदार को फोन कर ड्राईवर को रेस्ट देने के लिये कहा साथ ही मैंने अपने बड़े साहब को भी बता दिया। बड़े साहब का अर्थ काफी गहरा है। वे उसके कर्ता-धर्ता हैं। और उन से ऊपर बस दो पद और हैं। मुझे ड्राईवर की हालत पर तरस आ रहा था और मेरे सामने बंधुआ मजदूर का सीन घूम रहा था। उसके एक साथी को बस इस बात के लिये मालिक ने निकाल दिया था कि उसने कम्पनी नियमों के तहत अपनी सेलरी माँग ली थी। इनकी हालत यह है कि नियमानुसार इन्हे आठ घंटे काम करना चाहिये और बदले में दो हज़ार प्रतिमाह वेतन मिलना चाहिये। लेकिन ठेकेदार इन्हें पंद्रह सौ रुपये प्रतिमाह देता है साथ ही ड्यूटी का हाल तो मैंने लिख ही दिया। कुछ बोला या कहा सुना तो यह ड्राईवरी भी गयी हाथ से।

खैर यहाँ मुद्दा कुछ और है।

बड़े साहब को यह बात मेरे द्वारा पता चली। पता चलने का अर्थ देखिये यह ड्राईवर रोज़ उन्हें गाड़ी से लाता और घर छोड़ता है शेष समय आफिस के अन्य कार्य भी करता है यहाँ ड्यूटी चौबीस घंटे की है सो यह समझना ज़रूरी है कि उसे रात में भी आराम नहीं मिलता। साहब यह रोज़ देखते हैं कि एक ही ड्राईवर रोज़ उन्हें ला रहा है और छोड़ रहा है लेकिन उन्हें यह पता नहीं  कि वह निरंतर ड्यूटी कर रहा है। कैसी विडंबना है। पता होने का क्या अर्थ है। क्या देख कर पता नहीं  चलता कि उनकी नाक के नीचे कितना अमानवीय कार्य चल रहा है। खैर जब मेरे द्वरा उन्हें पता चला तो यह एक मुद्दा बन गया। अब चुप नहीं बैठा जा सकता था। यह ठीक वही बात है कि जब मीडिया किसी ख़बर को उठा दे तो उस पर कदम उठाना ही पड़ेगा वर्ना जवाब देना मुश्किल होगा कि पता होने के बाद भी सक्षम अधिकारी ने कदम क्यों नहीं उठाया। सो इस पता होने में कुछ करने की अभिलाषा कम और अपनी जान आफ़त में पड़ने से बचाना अधिक है। ऐसे पता होने पर दिखावे के लिये कुछ न कुछ कदम तो उठाना ही पड़ेगा। हमारे देश में ऐसा ही होता है। जब कहा जाये कि आपको पता था तो आपने क्या किया? ऐसे में यही सवाल जब किसी स्वास्थय विभाग के डाक्टर से होता है तो वह कहता है सर डेंगू से बचाव के लिये हमने विज्ञापन छपवाया था। लोग पढ़ें और अपने आस-पास साफ-सफाई का ध्यान रखें। बहुत खूब वे क्या करेंगे?

खैर जनाब हाईट यह कि जब उन्हें लगा कि कल को जवाब तलब हो सकता है तो उन्होंने इस मुद्दे को मीटिंग में उठाया कि एक ड्राईवर लगातार कई दिनों से ड्यूटी कर रहा है क्या करें। उन्हें ठेकेदार को बुला कर उसे डाँटना चाहिये था या फिर उस गाड़ी को कांट्रेकटर के पास भेज देना था। कुछ नहीं तो एक लेटर लिख कर उसे आर्थिक दंड ही दिया जा सकता था। जो बस सीधा और उनके हाथ का काम था इस चीज़ में कुछ पूछने की ज़रूरत ही नहीं थी। मगर नहीं हद है कि इतनी छोटे से कदम को न उठा कर मुद्दा मीटिंग में उठाया जाता है।

यह एक मीटिंग का हाल नहीं है हमारे देश में बहुत सी बड़ी और कीमती मीटिंग में यह चर्चा की जाती है कि पार्टी का मीनू क्या होगा और स्वीट डिश में आईस्क्रीम ठीक रहेगी या रसगुल्ला। हमारे साहब लोग जिनका वेतन पचास हज़ार प्रतिमाह से ऊपर है वे अपने ही ड्राईवर को सही वेतन और छुट्टी नहीं दिला पा रहे हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि कोई किसी के लफड़े में नहीं पड़ना चाहता। आप विश्वास मानिये बड़ी बड़ी बातें करना और आदर्शवाद झाड़ना एक चीज़ है और अपने आस पास की छोटी छोटी चीज़ों को सही कर पाना दूसरी। तभी तो मैं कहता हूँ कि मैं अभिमन्यु हूँ। ज़रा सोचिये इस लड़ाई को आगे बढ़ाने पर मेरी क्या हालत होगी। साहब नाराज़ होंगे, प्रमोशन नहीं मिलेगी और ढेरों नये ख़तरे और आयेंगे।

जानते हैं साहब क्यों नहीं कुछ बोलते कांट्रेक्टर से क्योंकि वह लोकल माफिया है उसे बोल कर कौन आफ़त ले। और देखिये अगर गाड़ी वापस भेज दी तो अपने आराम का क्या होगा।

यही तो चक्रव्यूह है जिसमें हम सब उलझे हुये हैं और नहीं जानते कि इस चक्रव्यूह के अंतिम द्वार को तोड़ें तो कैसे तोड़ें हम सभी अभिमन्यु बन इस चक्रव्यूह से लड़ते लड़ते समाप्त हो जाते हैं। मेरे कहने के बाद वह ड्राईवर तो बदल गया पर अब नये ड्राईवर को भी लगातार ड्यूटी करते सात दिन हो गये हैं।

मुझे लगता है एक बार फिर मुझे अभिमन्यु बनना पड़ेगा नयी बात उठाने के लिये।


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