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| 05.28.2007 |
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ज़माना ख़राब है
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ऐ यार-ए-ख़ुश ख़राम ज़माना ख़राब है
मलबूस ज़द में है हवास की जवान परी
उड़ती हैं सूफ़ियों के लिबादों में बोतलें
सैर-ए-चमन को गेसू-ए-मुश्कीं
बिख़ेर कर
कह तो रहा
हूँ
उनसे बड़ी देर से
‘अदम‘ क़याम=रहना, बसना |
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