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| 06.26.2007 |
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वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे |
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वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायेनात
ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
फ़कीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
बहार-ओ-ख़िज़ां निगाहों के वहम
‘अदम’ भी है तेरा हिकायत_कदाह |
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