| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 06.26.2007 |
|
सबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं |
सबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं हमें शराब पिलाओ बहार के दिन हैं सबू=प्याला ये काम आईन-ए-इबादत है मौसम-ए-गुल में खारों को गले से लगाओ बहार के दिन हैं आईन-ए-इबादत=पूजा का नियम ठहर ठहर के न बरसो उमड़ पड़ो यक दम सितमगरी से घटाओ बहार के दिन हैं शिकस्ता-ए-तौबा का कब ऐसा आएगा मौसम ‘अदम’ को घेर के लाओ बहार के दिन हैं शिकस्ता-ए-तौबा= तोबा की पराजय |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|