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| 04.28.2007 |
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फूलों की टहनियों पे नशेमन बनाइये |
| फूलों की टहनियों पे नशेमन बनाइये बिजली गिरे तो जश्ने-चिरागां मनाइये नशेमन=घोंसला; जश्ने-ए-चिराग़ां=प्रकाश का उत्सव/ दिवाली कलियों के अंग अंग में मीठा सा दर्द है बिमार निकाहतों को ज़रा गुदगुदाइये निकाहत=सुगन्ध कब से सुलग रही है जवानी की गर्म रात ज़ुल्फें बिखेर कर मेरे पहलू में आईये बहकी हुई सियाह घटाओं के साथ साथ जी चाहता है शाम-ए-अबद तक तो जाईये शाम-ए-अबद=अनन्त संध्या सुन कर जिस हवास में ठंडक सी आ बसे ऐसी काई उदास कहानी सुनाईये हवास=अनुभव रस्ते पे हर कदम पे ख़राबात हैं ”अदम” ये हाल हो तो किस तरह दामन बचाईये ख़राबात=मदिरालय |
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