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| 05.28.2007 |
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फूलों की आरजू में बड़े ज़ख्म खाए हैं
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फूलों की आरजू में
बड़े
ज़ख्म खाए हैं
उस पर हराम है ग़म-ए-दौरां की तल्ख़ियाँ
महशर में ले गई थी तबीयत की सादगी
महशर=निर्णय का दिन, जहाँ पर उत्पात हो रहा हो
आया
हूँ
याद बाद-ए-फ़ना उनको भी
‘अदम‘
बाद-ए-फ़ना=मृत्यु के बाद
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