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| 04.28.2007 |
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जो लोग जान बूझ के नादान बन गए |
जो लोग जान बूझ के नादान बन गए मेरा ख़्याल है कि वो इन्सान बन गए हम हश्र में गए मगर कुछ न पूछिए वो जान बूझ कर वहाँ अनजान बन गए हश्र=प्रलय के बाद निर्णय का दिन हँसते हैं हम को देख के अर्बाब-ए-आगही हम आप की मिज़ाज की पहचान बन गए अर्बाब-ए-आगही=बुद्धिजीवी (बुद्धिमान) इन्सानियत की बात तो इतनी है शेख़ जी बदक़िस्मती से आप भी इन्सान बन गए काँटे बहुत थे दामन-ए-फ़ितरत में ऐ “अदम” कुछ फूल और कुछ मेरे अरमान बन गए |
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