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| 04.28.2007 |
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अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे |
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अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे
या समात का भरम है या किसी नग़में की
गूँज
किस ने खोला है हवा में ग़ेसूओं को नाज़ से
उसकी नाज़ुक
उँगलियों को देख कर अकसर “अदम” |
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