शायरी
अब दो आलम से
ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
अपनी ज़ुल्फों को
हँस के बोला करो
जो लोग जान बूझ के
आप अगर हम को
फूलों की
टहनियों पे
फूलों की आरजू में
ज़माना ख़राब है
वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
सूरज की हर किरन
सबू को दौर में लाओ