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फ़िसादो दर्द और दहशत में जीना
मिला यह आदमी को आदमी से
बुरा कहते हैं हम क्यों किस्मतों को
बढ़ी हैं रंजिशें अपनी कमी से
वतन ऐसा जलाया बिजलियों ने
सहम जाते हैं अब हम रोशनी से
जहाँ गुज़रा था एक बचपन सुहाना
वह दर छूटा है कितनी बेदिली से
न जब कोई तुम्हारे पास होगा
बहुत पछताओगे मेरी कमी से
कभी तो यह हक़ीकत मान लोगे
तुम्हें चाहा है मैंने सादगी से
हुई सब ग़र्क़ वो ख़्वाहिश ‘रज़ा’ की
सुनाएँ किया तुम्हें अपनी ख़ुशी से
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