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फिर
किसी
आवाज़
ने
इस
बार
पुकारा
मुझको
ख़ाौफ़
और
दर्द
ने
क्योंकर
यूँ
झिंझोड़ा
मुझको
मैं
सोया
हुआ
था
ख़ाक़
के
उस
बिस्तर
पर
जिस
पर
हर
जिस्म
नयी
ज़िन्दगी
ले
लेता
है
बस
ख्यालों
में
नहीं
असल
में
सो
लेता
है
आँख
खुलते
ही
एक
मौत
का
मातम
देखा
अपने
ही
शहर
में
दहशत
भरा
आलम
देखा
किस
क़दर
ख़ौफ़
ज़दा
चीख़ा
की
आवाज़
थी
वो
बूढ़ी
बेवा
की
दम
तोड़ती
औलाद
थी
वो
एक
बिलखते
हुये
मासूम
की
किलकार
थी
वो
कुछ
यतीमों
की
सिसकती
हुई
फ़रियाद
थी
वो
मुझको
याद
आया
फिर
एक
बार
वो
बचपन
मेरा
कुहरे
की
धुंध
में
लिपटा
हुआ
सपना
मेरा
तब
हम
एक
थे
इन्सानियत
की
छाँव
तले
अब
हम
अनेक
हैं
हैवानियत
के
पाँव
तले
तब
हम
सोचते
थे
सब्ज़
और
ख़ुशहाल
वतन
अब
हम
देखते
हैं
ग़र्क
और
लाचार
वतन
तब
फूल
थे
खुशियाँ
थीं
और
हम
सब
थे
अब
भूख
है
ग़मगीरी
और
हम
या
तुम
तब
तो
जीते
थे
हम
और
तुम
हम
सबके
लिये
अब
तो
मरते
हैं
हम
और
तुम
सिर्फ़अपने
लिये
अब
न
वो
इन्सान
रहा
और
न
वो
भगवान
रहा
बस
दूर
ही
दूर
तक
फैला
हुआ
हैवान
रहा
देख
लो
सोचलो
शायद
सम्भल
पाओगे
रुह
और
जिस्म
के
रिश्तों
को
समझ
पाओगे
क्यों
जुदा
करते
हे
रुह
से
जिस्म
“रज़ा ”
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