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05.03.2012
 

अपने शहर की एक सोई हुई आवाज़
अब्बास रज़ा अलवी


फिर किसी आवाज़ ने इस बार पुकारा मुझको
ख़ौफ़ और दर्द ने क्योंकर यूँ झिंझोड़ा मुझको
मैं सोया हुआ था ख़ाक़ के उस बिस्तर पर
जिस पर हर जिस्म नयी ज़िन्दगी ले लेता है
बस ख्यालों में नहीं असल में सो लेता है
आँख खुलते ही एक मौत का मातम देखा
अपने ही शहर में दहशत भरा आलम देखा
किस क़दर ख़ौफ़ ज़दा चीख़ा की आवाज़ थी वो
बूढ़ी बेवा की दम तोड़ती औलाद थी वो
एक बिलखते हुये मासूम की किलकार थी वो
कुछ यतीमों की सिसकती हुई फ़रियाद थी वो
मुझको याद आया फिर एक बार वो बचपन मेरा
कुहरे की धुंध में लिपटा हुआ सपना मेरा
तब हम एक थे इन्सानियत की छाँव तले
अब हम अनेक हैं हैवानियत के पाँव तले
तब हम सोचते थे सब्ज़ और ख़ुशहाल वतन
अब हम देखते हैं ग़र्क और लाचार वतन
तब फूल थे खुशियाँ थीं और हम सब थे
अब भूख है ग़मगीरी और हम या तुम
तब तो जीते थे हम और तुम हम सबके लिये
अब तो मरते हैं हम और तुम सिर्फ़अपने लिये
अब न वो इन्सान रहा और न वो भगवान रहा
बस दूर ही दूर तक फैला हुआ हैवान रहा
देख लो सोचलो शायद सम्भल पाओगे
रुह और जिस्म के रिश्तों को समझ पाओगे
क्यों जुदा करते हे रुह से जिस्म “रज़ा”
क्या कभी इस तरह तुम चैन से सो पाओगे


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