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05.03.2012
 

रंगीन पतंगें
अब्बास रज़ा अलवी


अच्छी लगती थीं वो सब रंगीन पतंगें
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगें
कुछ सजी हुई सी मेलों में
कुछ टंगी हुई बाज़ारों में
कुछ कटी हुई कुछ लुटी हुई
कुछ फंसी हुई सी तारों में
कुछ उलझी नीम की डालों में
उस नील गगन की छाओं में
सावन की मस्त बहारों में
पर थीं सब अपने गाँव में

अच्छी लगती थीं वो सब रंगीन पतंगें
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगें
था शौक मुझे जो उड़ने का
आकाश को जा छूने का
सारी दुनिया में फिरने का
हर काम नया कर लेने का
अपने आँगन में उड़ने का
ऊपर से सबको दिखने का
फिर उड़ कर घर आ जाने का
दादी को गले लगाने का
कैसी अच्छी लगती थीं बेफ़िक्र उमंगें
वो सब रंगीन पतंगें
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगें

अब बसने नये नगर आया
सब रिश्ते नाते तोड़ आया
बचपन भी अपना छोड़ आया
कुछ पाया और कुछ खो आया

दिल कहता हैं मैं उड़ जाऊँ,
बन कर फिर से रंगीन पतंग
कटना है तो फिर कट जाऊँ,
बन कर फिर से रंगीन पतंग
लुटना है तो फिर लुट जाऊँ
बन कर फिर से रंगीन पतंग
आकाश में ही फिर छुप जाऊँ
बन कर फिर से रंगीन पतंग

पर गिरूँ उसी ही आँगन में
और मिलूँ उसी ही मिट्टी में
जिसमें सपनों को देखा था
जिसमें बचपन को खोया था
जिसमें मैं खेला करता था
जिसमें मैं दोड़ा करता था
जिसमें मैं गाया करता था सुरदार तरंगें
जिसमें दिखती थी मुझको बस खुशहाल उमंगें
वो सब रंगीन पतंगें
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगें


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