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05.03.2012
 

फूलों का आँगन
अब्बास रज़ा अलवी


शायद फिर उस आँगन में कुछ फूल खिलते हों
जिनकी मस्त ख़ुशबू आज तक मेरे ज़हन में है
वही आँगन जहाँ दिखती थी दुनिया किलकिलाती सी,
मुझे हर सू बुलाती सी,
वही आँगन जहाँ गुज़री थीं मेरी चाँदनी रातें
कहानी सी सजी बातें
वही आँगन जहाँ मैं खेलता था, दौड़ता था,
पेड़ के झले में घन्टों झूलता था
वही आँगन जहाँ था नीम का लम्बा दरख़्त
अदना, बहुत ऊँचा
जिसको मैं ख़ुद से नापता था, सोचता था
एक दिन बहुत बड़ा हो जाऊँगा
नीम से भी ऊँचा उठ जाऊँगा
और छू लूँगा वह नीला अम्बर
तोड़ूँगा वह सब चाँद सितारे
जिनको दादी हर रात दिखाती है
अनमोल कहानी में हर रात सुनाती है।

एक ऊँची सी दीवार थी, बग़ल में,
उस आँगन के
पीली मिट्टी से लिपी हुई कुछ चूने से पुती हुई
दीवार में मुझको दिखती थीं लाखों तस्वीरें
देखा करता था जिनको मैं घन्टों घन्टों
और फिर मैं ख़ुद को पाता था उस दुनिया में
जो रंगी हुई थी खुशियों से
और सजी हुई थी चाहों से
जिसमें मुझको दिखते थे बस सपने ही सपने
जिसमें मुझको लगते थे सब अपने ही अपने
और जब दीवार पर बैठा कबूतर का जोड़ा गुटुर गुटुर गाता
मैं भी उनके साथ एक गीत गुनगुनाता
अचानक रामू कुन्डी खटखटाता और कहता
रज़ा, चलो चल कर खेलते हैं, फूलों के आँगन में

हाँ ऐसा ही था मेरा बचपन
उस आँगन में, जिसमें, वह फूल खिलते थे
पर अब वह आँगन, मैं पिछले बरस छोड़ आया हूँ
एक नया सूद उतारने की ख़ातिर
आँगन का वह हिस्सा जिसमें फूल खिलते थे
पटवारी को आधे दाम बेच आया हूँ

कल घर से रामू का ख़त आया है, लिखता है

डियर रज़ा
तुम बाहर अच्छे होगे
किल फिर मैं तुम्हारे घर गया था
आँगन की वह दीवार जिस पर कबूतर
बैठते थे
पिछले महीने बरसात में गिर गयी
आँगन में वह फूल
जिनसे हम खेलते थे
दीवार के नीचे धँस गय
पटवारी ने नीम का दरख़्त कटवा दिया है
आँगन को सीमेन्ट से पटवा दिया है
और अब वह आँगन में बहुत बड़ा सा
एक ऊँचा सा, आलीशान सा,
घर बनवा रहा है
उस आँगन में, जिसमें हम तुम खेलते थे
उस आँगन में, जिसमें वह फूल खिलते थे
                                   तुम्हारा दोस्त-- रामू


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