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05.28.2007
 

ये आरजू थी तुझे गुल के रूबरू करते
आतिशहैदर अली


 

ये आरज़ू थी तुझे ग़ुल के रूबरू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ्तगू करते

प्याम बार ना मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शार की आरज़ू करते


मयस्सर=उपलब्ध; शार=शरारत, चंचलता

 

मेरी तरह से माह-ओ-मेहर भी हैं आवारा
किसी हबीब को ये भी हैं जुस्तजू करते


माह-ओ-मेहर=चाँद और सूर्य; हबीब=मित्र

 

जो देखते तेरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम
असीर होने की आज़ाद आरज़ू करते


असीर=बन्दी

ना पूछ आलम-ए-बरगश्ता ताली-ए-आतिश
बरसाती आग में जो बारां की आरज़ू करते


बरगश्ता=पलटना, विपरीत होना, उलटना; बारां=वर्षा
ताली=भाग्य; आतिश=अग्नि



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