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| 05.28.2007 |
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ये आरजू थी तुझे गुल के रूबरू करते |
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ये आरज़ू थी तुझे ग़ुल के रूबरू करते
प्याम बार ना मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
मेरी तरह से माह-ओ-मेहर भी हैं आवारा
जो देखते तेरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम
ना पूछ आलम-ए-बरगश्ता ताली-ए-आतिश
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