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| 04.14.2007 |
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रिश्ता मन से मन का आस्था |
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मन के भाव रिश्ते की परिभाषा को ढूँढते रहे मन ही मन शब्दों की माला में उलझकर इस ओर से उस ओर से मूक सफ़र करते रहे मन ही मन हर संशय सहजता से सुलझाकर एक दूजे को समझते रहे मन ही मन जाने कैसे कब कहाँ अटूट प्रेम से बंधते रहे मन ही मन ये मन के भाव! |
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