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04.14.2007
 
दिशाहीन
आस्था

जाने किस दिशा में
खोया ये मन..
कुछ नज़र आता नहीं..
एक
अनजाना सा अहसास
मीठी सी चुभन...
न ही उलझी हुई
न ही सुलझी हुई
पर जैसे
कोहरा में छिपी हुई...
आँखें साफ कर कर
देखना चाहूँ...
खुद के ही मन में
झाँकना चाहूँ..
पर कुछ भी
नज़र आता नहीं...
अपना आप ही
जैसे गुम हुआ..
खुद को खोकर भी
अनजान हूँ...
किसी को पाया या
खुद को खोया...?
ये सोच सोच
परेशान हूँ..
मेरी जीत है
या कि हार..
कुछ समझ आता नहीं...!
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