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ISSN 2292-9754

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03.06.2016


मुँह छिपाकर सभी से मैं रोता रहा

अब न ख़ुश कर सका मैं उन्हें जानें क्यों,
मुँह छिपाकर सभी से मैं रोता रहा।
यूँ ही दुनिया का सब कुछ भुलाकर सदा,
ग़म की गलियों में बस मैं यूँ खोता रहा॥

न फ़िक्र है उन्हें और गिला मुझको भी,
दोष उनका नहीं सब मेरा दोष है।
उनको देखूँ यूँ मूरत में अब तो सदा,
अब इसी आस से ही तो सन्तोष है।
सम कृपा करने की रीत उनकी परा,
यूँ भुलाकर ही दुःख में मैं सोता रहा।

अब न ख़ुश कर सका मैं उन्हें जानें क्यों,
मुँह छिपाकर सभी से मैं रोता रहा॥

आस-रीति ये अंकुर की है सम प्रबल,
वो मिलेंगें मुझे फिर कभी न कभी।
जिनको देखें सभी भक्त निज नेत्र से,
उनको सपनों में पाने मैं सोता रहा।
अब न ख़ुश कर सका मैं उन्हें जाने क्यों,
मुँह छिपाकर सभी से मैं रोता रहा॥


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